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उ पखंड (2) का परंतुक इतना अधिक महत्वपूर्ण है और सभा का ध्यान इसकी ओर खींचा गया है। यह बिल्कुल सच है कि राज्यों द्वारा कुछ बिक्री कर इस प्रकार के लगाए गए हैं, जो कि अनुच्छेद 264क में अंतर्विष्ट उपबंधों के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाते हैं। उस लेवी को संभवतः उपबंधों से बाहर रखा जाता है। इसलिए यह महसूस किया गया है कि संविधान में परिकल्पित कानून का शासन जब प्रभावी हो तो सभी कानून जो कि संविधान के उपबंधों के अनुरूप नहीं हो, समाप्त माना जाएगा। आय पर बहुत तक उनकी वित्तीय स्थिति आधारित है, के लिए कतिपय प्रकार की वित्तीय कठिनाई या असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए संविधान के सामान्य उपबंधों के स्पष्टीकरण के रूप में यह प्रस्ताव किया गया है कि किसी प्रकार की असंगत स्थिति होने या अनुच्छेद 264क के उपबंधों के विपरीत किसी राज्य द्वारा लगाए गए किसी बिक्री कर के बाद भी, ऐसा कानून 31 मार्च, 1951 तक जारी रहेगा अर्थात् हमने व्यावहारिक तौर पर राज्यों को इस प्रकार के समायोजन करने का कुछ और महीने का समय देने का प्रस्ताव किया है ताकि वे इस अनुच्छेद के उपबंधों के अनुरूप कानून बना सके।
मैं नहीं समझता हूँ कि जहाँ तक मेरे द्वारा प्रस्तुत संशोधन का संबंध है, उसके बारे में कोई और आगे स्पष्टीकरण दिया जाना आवश्यक है लेकिन, यदि कोई मुद्दा उठाया जाता है तो मैं बहस का उत्तर देन में प्रसन्नता का अनुभव करूँगा।
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1 श्री महावीर त्यागीः ब्रिक्री कर की वर्तमान प्रणाली में बहुत सारे दोष हैं। अब दिल्ली में कोई बिक्री कर नहीं है_ संयुक्त प्रांत में मोटर कार, रेडियो, साईकिल और अन्य चीजों पर बिक्री कर लगाए जाते हैं। मेरठ का कोई भी नागरिक जब भी मोटर कार या साईकिल खरीदना चाहता है तो वह वहाँ के स्थानीय दुकान में नहीं जाता। स्थानीय एजेंसी को नुकसान झेलना पड़ता है। वह व्यक्ति दिल्ली आता है। मैं देख रहा हूँ कि डॉ. अम्बेडकर मुझे चुप रहने के लिए इशारा कर रहे हैं_ वह मुझ पर अनुचित प्रभाव डाल रहे हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं मुद्दे को समझ चुका हूँ।
श्री महावीर त्यागीः क्या आप इस बात को समझ चुके हैं? क्या आप इससे समहत हैं? क्या आप मेरी बात को ध्यान में रखने के लिए तैयार हैं? आपके पीछे लोगों के शिष्टमंडल हैं। डॉ. अम्बेडकर, मैं आपको यह आश्वस्त कर सकता हूँ यदि आप न्यायप्रिय हैं और यदि आपको न्याय की पहचान है तो आप बाद में अपने जीवन में भारत के श्रेष्ठ न्यायाधीश बन सकते हैं, यदि आप नागरिकों के साथ न्याय करें। महोदय, मेरा कहना यह है कि इस तरीके से कर लगाए जा रहे हैं
1 सी.ए.डी. खंड 10, 16 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 330-331