अनुच्छेद 264क - Page 119

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1 माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, सभा के समक्ष तीन संशोधन हैं। पहला संशोधन मेरे मित्र प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना का है। उनके संशोधन के अनुसार उन्होंने जो प्रस्ताव किया है वह यह है कि बिक्री कर लगाए जाने की शक्ति व्यावहारिक तौर पर संसद के पास होनी चाहिए। इस प्रस्ताव पर दो मौलिक आपत्तियाँ हैं। पहल तो यह है कि इस मामले को विभिन्न समयों में प्रांतों के प्रमुख तथा भारत सरकार के वित्त विभाग के बीच उठाया जाता रहा है, जिसमें बिक्री कर लगाए जाने से उत्पन्न कठिनाइयों को दूर करने के लिए बेहतर होता कि यदि कर लगाया जाए और उसकी वसूली केंद्र द्वारा की जाए तथा कुछ स्वीकृत सिद्धांतों या किसी आयोग द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर उसे प्रांतों के बीच वितरित कर दिया जाए। सौभाग्यवश या दुर्भाग्यवश प्रांतों के प्रमुखों को इस सिद्धांत पर आपत्ति थी और महोदय, मेरे विचार से उन लोगों का निर्णय सही था।

यद्यपि मैं यह कहने को तैयार हूँ कि प्रारुप संविधान की योजना में निर्धारित की गई वित्तीय प्रणाली किसी भी अन्य विशेष प्रणाली जिसकी जानकारी मुझे है, से बेहतर है। मैं समझता हूँ कि यह कहा जाना चाहिए कि इसमें एक दोष है। वह दोष यह है कि प्रांत काफी व्यापक तौर पर केंद्र द्वारा मुहैया कराए जाने वाले अनुदानों पर अपने संसाधनों के लिए निर्भर होते हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक तरीका जिसके माध्यम से एक जिम्मेदार सरकार कार्य कर सकती है वह है विधानमंडल में धन विधेयक प्रस्तुत करने की शक्ति को निहित किया जाना। इस योजना के अंतर्गत हमने यह प्रस्ताव किया है_ प्रांत में प्रस्तुत किए जाने वाला कोई भी विधेयक बहुत ही संक्षिप्त प्रकार का होना चाहिए। वे प्रत्यक्ष रूप से जो कर लगा सकें उनका स्वरूप बहुत ही लघु होना चाहिए और विधानमंडल अपने ‘‘अविश्वास प्रस्ताव के रूप में’’ इसे दर्ज करने के लिए व्यवहारिक तरीके के रूप में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए और करों को खारिज करके सरकार के समक्ष कठिनाई उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। इसलिए, मैं समझता हूँ कि बड़ी संख्या में संसाधन जिन पर प्रांत निर्भर करते हैं, केंद्र में संकेंद्रित कर दिया गया है, संवैधानिक सरकार की दृष्टि से यह वांछनीय है कि कम से कम राजस्व के एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रांतों के पास छोड़ने चाहिए। इसलिए, मैं समझता हूँ कि मेरी दृष्टि से बिक्री कर लगाने की जिम्मेदारी प्रांतों के हाथों में दी जानी बहुत ही उचित है। ऐसी स्थिति में मैं समझता हूँ कि मेरे मित्र प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना द्वारा प्रस्तुत संशोधन का कोई तुक नहीं है।

मेरे मित्र त्यागी द्वारा प्रस्तुत संशोधन का जहाँ तक संशोधन है, मैं यह कहना चाहूँगा कि उन्होंने जो कुछ कहा है उससे मुझे काफी सहानुभूति है। इसके बारे में कोई संशय नहीं है कि 1937 में जब बिक्री कर शुरू किया गया था, तो यह राजस्व का एक महत्वहीन स्रोत हुआ करता था। मैंने बंबई और मद्रास के मामले में आंकड़े की जाँच की

1 सी.ए.डी. खंड 10, 16 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 339-340