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है। वर्ष 1937 में मद्रास में लगभग 2.35 करोड़ रुपए का कर लगाया गया था। आज, यह राशि लगभग 14 करोड़ रुपए के बराबर है। बंबई के मामले में भी यही स्थिति थी, अर्थात् 1937 में लगभग 3.5 करोड़ रुपए का कर लगाया गया था और आज यह 14 करोड़ रुपए के आस-पास ही बैठता है। इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि इसमें काफी अधिक वृद्धि हो चुकी है और मेरा मानना है कि राजस्व बढ़ाने के प्रयोजन से बिक्री कर के साथ खिलवाड़ किया जाना वांछनीय है और इसका साधारण सा कारण यह है कि किसी भी कराधान प्रणाली को दो सिद्धांतों जिनके बारे में, मैं जानता हूँ, के आधार पर बदला जा सकता है। एक तो विभिन्न वर्गों के बीच व्यापक साम्यता को बनाए रखना है। यदि किसी एक वर्ग पर दूसरे वर्ग की तुलना में अधिक बिक्री कर लगाया जाता है तो उस बोझ को बराबर सा ढोने के लिए कराधन प्रणाली को अपनाया जाना न्यायोचित है।
दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत जिसे मेरे विचार से पूरे विश्व भर में अपनाया गया है, यह है कि किसी भी कराधान प्रणाली का उपयोग इस प्रकार से नहीं किया जाना चाहिए कि लोगों के जीवन के स्तर में कमी आ जाए। और मेरे मन में जरा भी संशय नहीं है कि बिक्री कर का प्रांत के लोगों के जीवन स्तर से बड़ा ही गहरा ताल्लुक है। लेकिन, मुझे अपने मित्र के प्रति सभी प्रकार की सहानुभूति होने के बावजूद मैं यह पाता हूँ कि यदि उनके संशोधन को स्वीकार कर लिया जाता है तो इसका अर्थ यह होगा कि बिक्री कर लगाने की प्रांतों की शक्ति स्वतंत्रता और निर्बाध नहीं रह जाएगी। यह संसद द्वारा निर्धारित सीमा के विषयाधीन हो जाएगी। मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम प्रांतों को बिक्री कर लगाने की अनुमति देते हैं तो प्रांतों को प्रांत की बदलती स्थिति के अनुसार बिक्री करों की दर को समायोजित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और इसलिए, केंद्र द्वारा निर्धारित की जाने वाली कोई भी सीमा बिक्री कर के कार्यकरण के मामले में बड़ी बाधा उत्पन्न करेगी। मुझे इसमें कोई संशय नहीं है कि मेरे मित्र श्री त्यागी यदि प्रांतीय विधानमंडल जाएँगे तो वह प्रांतीय सरकारों को यह कहते हुए अपने विचार को आगे बढ़ाएँगे कि लोगों के जीवन स्तर पर बिक्री का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है और इसलिए इसे निर्धारित करते समय उन्हें बहुत ही सतर्क रहना चाहिए।
श्री महावीर त्यागीः क्या मैं आपके लिए इतना अधिक असुविधाजनक हो गया हूँ?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः बिल्कुल नहीं। यदि मैं प्रमुख होता तो मैंने भी वही रवैया अपनाया होता जो आपने अपनाया है।
अब, अपने माननीय मित्र पंडित कुँजरू के संशोधन पर आता हूँ। मेरा यह