अनुच्छेद 264क - Page 121

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मानना है कि उनके संशोधन का प्रयोजन व्यावहारिक तौर पर उपखंड (1) जहाँ हमने इस तथ्य पर भी जोर दिया है कि बिक्री कर का मूल स्वरूप ऐसे कर खपत के आधार पर निर्धारित किया जाना चाहिए, के स्पष्टीकरण से पूरा हो जाता है और मैं नहीं समझता कि उनके संशोधन से इस मामले में बहुत अधिक सुधार होने जा रहा है।

मैं समझता हूँ कि केवल एक ही मुद्दा है जिसके बारे में मुझे कुछ कहना चाहिए। मैं जानता हूँ कि मेरे कुछ ऐसे मित्र हैं जो उपखंड (1) में प्रयुक्त किए गए ‘‘निर्यात और आयात के दौरान’’ शब्दों को पसन्द नहीं करते हैं। अब, प्रारुप समिति में सही शब्द का चुनाव करने के लिए इस पर काफी समय लगाया है। जहाँ तक उनका संबंध है वे लोग संतुष्ट हैं कि जो भी शब्द गढ़े जा सकते थे उनमें यह शब्द काफी अच्छा है। लेकिन मैं यह कहने को तैयार हूँ कि प्रारुप समिति इस शब्द विशेष की आगे और जाँच करेगी ताकि यह देखा जा सके कि क्या कोई दूसरा शब्द इसके स्थान पर प्रयुक्त किया जा सकता है ताकि इस आलोचना के मुद्दे को समाप्त किया जा सके जोकि अनुच्छेद के इस भाग के विरुद्ध लगाई गई है। महोदय, मुझे आशा है कि सभा अब संशोधन को स्वीकार कर लेगी।

श्री सभापतिः डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव पर मत लेने से पूर्व मैं कुछ शब्द विशेषकर इसलिए कहना चाहता हूँ क्योंकि मैं अपने सामने माननीय वित्त मंत्री को बैठे देख रहा हूँ। मैं अनुच्छेद जिसे प्रस्तुत किया गया है, के पक्ष या विपक्ष में कुछ भी नहीं कहना चाहता हूँ। लेकिन, मैं यह बताना चाहता हूँ कि प्रांतों विशेषकर उन प्रांतों के बीच जो गरीब हैं, के अंदर इस प्रकार की भावना व्याप्त है कि उनके राजस्व के संसाधनों में काफी कटौती की जा चुकी है और आयकर का वितरण इस ढंग से नहीं किया जा रहा है जिससे वे लोग संतुष्ट हो सकें। मैं वित्त मंत्री से जब वह आयकर के वितरण के प्रश्न पर विचार करें, से इस तथ्य को ध्यान में रखने के लिए कहना चाहता हूँ ताकि यह नहीं कहा जा सके कि भारत सरकार की नीति उन लोगों को और अधिक देने की है जिनके पास बहुत अधिक है और उन लोगों से जिनके पास बहुत कम है, से वापस लेने की है।

अब मैं विभिन्न संशोधनों पर मत लूँगा।

सभी संशोधन अस्वीकृत हुए।

{ डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत मूल प्रतिपादन स्वीकृत हुआ। अनुच्छेद 264क यथासंशोधित रूप में, संविधान में जोड़ा गया। }