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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं अनुच्छेद 280क को लेना चाहता हूँ।
पंडित हृदय नाथ कुँजरूः मैं उस अनुच्छेद को आज लिए जाने पर कड़ी आपत्ति व्यक्त करता हूँ। मुझे संशोधन आज सुबह ही मिला है। यह जिस मामले से संबंधित है वह बहुत ही महत्वपूर्ण है और हमें इस पर विचार करने के लिए कुछ समय दिया जाना चाहिए और यदि हम संशोधन पेश करना चाहें तो उसे पेश करने देना चाहिए।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः इसके अलावा, इस अनुच्छेद में एक नई प्रकार की आपातस्थिति लागू करने का प्रस्ताव किया गया है जो कि किसी भी प्रणाली में देखी नहीं गई।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मुझे आशा है कि आप सभा के कार्य के रास्ते में इस तकनीकी मुद्दों को आड़े नहीं आने देंगे। अब अगर माननीय सदस्यों को नौ बजे भी संशोधन मिले होंगे तो नौ बजे से बारह बजे तक उनके पास समय था। मैं नहीं समझता कि इस संशोधन में कोई भी चीज ऐसी है जो अस्पष्ट है। मेरे माननीय मित्र पंडित कुँजरू से बहुत ही कम बुद्धिमान व्यक्ति भी एक ही बार में पढ़ कर इसे समझ सकता है। मुझे इसके बारे में संदेह नहीं है।
पंडित हृदय नाथ कुँजरूः महोदय, यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मामला है और डॉ. अम्बेडकर की अधीरता और रूखेपन को सदस्यों के अधिकारों से खिलवाड़ करने के मार्ग में आड़े नहीं आने देना चाहिए, यह अधिकार नियमों के अंदर उन लोगों को अस्पष्ट रूप से दिए गए हैं। महोदय, मैं यह माँग करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर की सभा में संशोधन को पारित कराने की तीव्र इच्छा के बावजूद इस संशोधन पर विचार करने के लिए हमें और समय दिया जाना चाहिए।
श्री सभापतिः मेरा सुझाव यह है कि हमें कार्यसूची में दिए गए क्रम के अनुसार चलना चाहिए और अनुच्छेद 274-घघ को लेना चाहिए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं ऐसा करने के लिए तैयार हूँ। महोदय, लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमारे पास समय की इतनी कमी है कि मेरे विचार से इन तकनीकी मुद्दों को जरूरत से अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।
पंडित हृदय नाथ कुँजरूः यह दुखद है कि प्रारुप समिति के अध्यक्ष जिसे अपनी स्थिति के अनुसार अन्य सदस्यों के अधिकारों को समझना चाहिए, वह उनके अधिकारों की अवहेलना कर रहे हैं।
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