अनुच्छेद 280क - Page 125

110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है, संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को वित्तीय औचित्य

संबंधी ऐसे सिद्धांतों का पालन करने के लिए निर्देश देने तक जो निदेशों

में विनिर्दिष्ट किए जाएँ और ऐसे निर्देश देने तक होगा जिन्हें राष्ट्रपति उस

प्रयोजन के लिए देना आवश्यक और पर्याप्त समझे।

(4) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी -

(क) ऐसे किसी निदेश के अंतर्गत -

( i ) किसी राज्य के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले सभी या किसी वर्ग

के व्यक्तियों के वेतनों और भत्तों में कमी की अपेक्षा करने वाला उपबंध

( ii ) धन विधेयकों या अन्य ऐसे विधेयकों को, जिनको अनुच्छेद 207 के उपबंध

लागू होते हैं, राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित किए जाने के पश्चात्

राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखने के लिए उपबंध, हो सकेंगे_

(ख) राष्ट्रपति, उस अवधि के दौरान, जिसमें इस अनुच्छेद के अधीन की गई उदघोषणा प्रवृत्त रहती है, संघ के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले सभी या किसी वर्ग के व्यक्तियों के, जिनके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं, वेतनों और भत्तों में कमी करने के लिए निदेश देने के लिए सक्षम होगा।

महोदय, इस देश की वर्तमान आर्थिक और वित्तीय स्थिति को देखते हुए इस सभा में शायद ही कोई ऐसा सदस्य होगा जो इस नये अनुच्छेद 280क में अंतर्विष्ट किए गए कुछ ऐसे उपबंध किए जाने के पीछे जो चिंता है, उस पर विवाद खड़ा करेगा और इसलिए मैं प्रारुप संविधान में इस अनुच्छेद को शामिल किए जाने के औचित्य के बारे में बताने में कोई भी समय लगाना नहीं चाहता हूँ। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इस अनुच्छेद के कमोबेश संयुक्त राज्य अमेरिका के नेशनल रिकवरी अधिनियम जिसे 1930 या उसके आस-पास पारित किया गया था, के पैटर्न को अपनाया गया है, जो राष्ट्रपति को अमेरिकी लोगों के समक्ष मौजूद भारी मंदी के परिणामस्वरूप होने वाली कठिनाई के परिणामस्वरूप आर्थिक तथा वित्तीय कठिनाईयों को दूर करने के लिए राष्ट्रपति को उसी प्रकार के उपबंध करने की शक्ति प्रदान करता है। उदाहरण के लिए इसके पीछे जो तर्क है वह यह है कि हमने संविधान मेंसे उपबंध को शमिल करना जरूरी समझा है क्योंकि हम यह जानते हैं कि अमेरिकी संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा किए गए विधान को बहुत ही थोड़े समय बाद उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई और उच्चतम न्यायालय ने पूरे विधान को असंवैधनिक घोषि कर दिया, उच्चतम न्यायालय के उस घोषणा के परिणामस्वरूप राष्ट्रपति नेशनल रिकवरी अधिनियम के उपबंधों के अधीन वह कार्य मुश्किल से कर सकता है जो वह करना चाहता था। यदि यहाँ भी उसी प्रकार की