112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1 श्री बी. दासः मैं चाहता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर यह स्पष्ट करें कि क्या भारत के क्षेत्र में स्थित न्यायाधीश आयकर न्यायाधिकरण या विभिन्न न्यायाधिकरण जो हमारे यहाँ बने हुए हैं, पर भी लागू होता है। यदि इसकी शक्ति को विस्तारित किया जाता है, तो फिर आयकर न्यायाधिकरण को शीघ्र ही भंग कर दिया जाना चाहिए। हमारे यहाँ आयकर न्यायाधिकरण बना हुआ है जोकि अंतिम प्राधिकारी है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः क्या यह इस चर्चा के लिए संगतपूर्ण है? यहाँ पर आयकर न्यायाधिकरण की बात कहाँ से आ गई।
श्री बी. दासः इस अनुच्छेद में यह कहा गया है।
‘‘इस अध्याय में किसी बात के होते हुए भी, उच्चतम न्यायालय अपने विवेकानुसार भारत के राज्य क्षेत्र में किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा किसी वाद या मामले में पारित किए गए या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री, अवधारण, दंडादेश या आदेश की अपील के लिए विशेष इजाजत दे सकेगा।’’
मैं तो केवल आपसे यह आश्वासन चाहता हूँ कि ‘‘न्यायाधिकरण’’ का अर्थ ‘‘आयकर न्यायाधिकरण’’ नहीं है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः आपने दूसरे कर्मचारी भी कहा था। जहाँ तक मुझे याद है इसमें संशोधन किया जा चुका है ताकि आयकर मामलों के लिए भी उपबंध किया जा सके और उस पर उच्चतम न्यायालय में कार्यवाही की जा सके। मैं जानता हूँ कि इसे संशोधित किया जा सकता है।’’
पंडित ठाकुर दास भार्गवः महोदय, मेरी विनम्र राय में खड (2) बहुत ही व्यापक और अनावश्यक प्रतीत होता है। इसे निम्नलिखित रूप में पढ़ा जाता हैः
‘‘खंड (1) की कोई बात सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधा द्वारा या उसके अधीन गठित किसी न्यायालय या अधिकरण द्वारा पारित किए गए या दिए गए किसी निर्णय, अवधारण, दंडादेश या आदेश को लागू नहीं होगी।’’
जहाँ तक सैन्यकर्मियों और सैन्य अपराधों का संबंध है उन्हें उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार से अलग रखा जा सकता है। लेकिन, सशस्त्र सेना से संबंधित बहुत सारे कानून ऐसे हैं जो उन अधिनियमों के अधीन गठित न्यायालयों द्वारा दिए गए निर्णयों आदि से मिलते-जुलते हैं और उन मामलों के अभियुक्त नागरिक क्षेत्र में होते हैं या फिर सैन्यकर्मी दीवानी अपराधों के दोषी होते हैं। कैंटूनमेंट अधिनियम या प्रादेशिक सेना अधिनियम से संबंधित कुछ अपराध ऐसे होते हैं जिनमें नागरिक क्षेत्र के सदस्य दोषी होते हैं और इसका
* सी.ए.डी खंड 10, 16 अक्तूबर, 1949 पृष्ठ 378-380