113
कोई कारण नहीं दिखता कि उन मामलों में चाहे जो भी सजा सुनाई जाए, उसे उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार के विषयाधीन क्यों नहीं रखा जाना चाहिए। इसलिए मैं यह मानता हूँ कि यह खंड भी काफी व्यापक है और इसमें संशोधन की जरूरत है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय, मेरे माननीय मित्र, प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना ने जो बात कही है उसको देखते हुए मेरे लिए मेरे माननीय मित्र भी टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावित अनुच्छेद के संबंध में कुछ कहना जरूरी हो गया है। यह बिल्कुल सही है कि जब हम अनुच्छेद 112 और मेरे माननीय मित्र प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर विचार कर रहे थे तो उस समय एक अवसर था। मैंने यह कहा था कि अनुच्छेद 112 के अधीन उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार में कोर्ट मार्शल द्वारा दिए गए किसी आदेश के विरूद्ध की गई अपील को स्वीकार करना शामिल रहेगा। सैदधांतिक तौर परवह अवधारणा अभी भी सही है और उसके बारे में मेरे मन में कोई संशय नहीं है लेकिन मैं यह बताना भूल गयाः कि हमारे उच्च न्यायालयों के निर्णयों के साथ-साथ ब्रिटिश न्यायालयों जिनमें प्रिवी काउंसिल ही शामिल है, के निर्णयों के अनुसार यह एक सुस्थापित सिद्धांत बन गया है कि सिविल न्यायालयों के पास यद्यपि कानून के अंतर्गत क्षेत्राधिकार होता है लेकिन वे उस क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे ताकि कोर्ट मार्शल द्वारा पहुँचे किसी निष्कर्ष या दिए गए किसी निर्णय या पारित किए गए आदेश के सामने कोई बाधा खड़ी न हो। मैं इस कारण में नहीं जाना चाहता हूँ कि उच्चतर प्राधिकार वाले सिविल न्यायालयों द्वारा यह क्षेत्राधिकार होने के बावजूद यह क्यों कहा गया है कि वे उस क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करेंगे_ लेकिन इस तथ्य के बावजूद मैंने यह सोचा था कि यदि भारत में हमारे न्यायालय ब्रिटिश न्यायालयों - दि हाउस ऑफ लॉर्ड्स, किंग्स बैंच डिवीजन के साथ-साथ प्रिवी काउंसिल द्वारा दिए गए उसी प्रकार के निर्णय का पालन करते हैं और यदि मैं कहूँ तो हमारे फेडरल न्यायालय द्वारा दो या तीन मामलों में दिए गए निर्णय भी उसकी प्रकार के होते हैं तो फिर खंड (2) की जरूरत नहीं रहेगी लेकिन दुर्भाग्यवश रक्षा मंत्रालय का यह मानना है कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण मामले में संशय की स्थिति नहीं रखी जानी चाहिए और एक सांविधिक उपबंध होना चाहिए जिसमें यह कहा गया हो कि कोई भी उच्चतर सिविल न्यायालय चाहे वह उच्च न्यायालय हो या उच्चतम न्यायालय हो, सशस्त्र सेनाओं से संबंधित किसी कानून के अधीन गठित किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण के विरूद्धा इस प्रकार के क्षेत्राधिकार का प्रयोग नहीं करेगा।
यह प्रश्न सिर्फ सैद्धांतिक ही नहीं है बल्कि व्यावहारिक भी है क्योंकि इसमें संशस्त्र सेनाओं का अनुशासन अंतर्गस्त है। यदि सशस्त्र सेनाओं से संबंधित कोई मामला हो, तो उसमें अनुशासन बनाए रखना जरूरी होता है। रक्षा मंत्रालय का यह