अनुच्छेद 280क - Page 129

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मानना है यदि सशस्त्र सेनाओं का कोई कर्मी सशस्त्र सेनाओं में अनुशासन बनाए रखने के प्रयोजनार्थ गठित किसी न्यायालय या न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए किसी निर्णय के विरुद्ध शिकायत करने के लिए उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की ओर देखता है, तो अनुशासन समाप्त हो जाएगा। मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस तर्क के विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसी कारण से इस संशोधन विशेष के द्वारा अनुच्छेद 112 में (2) को जोड़ा गया है और उच्च न्यायालयों की पर्यवेक्षण रखने की शक्तियों से संबंधित उपबंधों के मामले में भी उसकी प्रकार का उपबंध किया गया है। अनुच्छेद 112 में (2) का उपबंध किए जाने के पीछे मेरा यही तर्क है।

फिर भी मैं यह बताना चाहूँगा कि खंड (2) उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय की शक्तियों को बिल्कुल वापस नहीं लेता। कानून किसी कानून विशेष के अधीन गठित न्यायाधिकरण की दया पर ही सशस्त्र सेना के किसी कर्मी को पूरी तरह से नहीं छोड़ता। अनुच्छेद 112 के खंड (2) के बने रहने के बावजूद भी उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के लिए इस क्षेत्राधिकार जो कि उसे सशस्त्र सेनाओं से संबंधित कानून द्वारा प्रदत्त शक्ति के माध्यम से प्रदान किया गया है, से आगे जाकर कोई निर्णय लिया गया है। उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ उच्च न्यायालय के लिए इस प्रश्न की जाँच करने का खुला विकल्प रहेगा कि क्या क्षेत्राधिकार का प्रयोग किया जाना कानून के दायरे के अधीन है जिसके माध्यम से इस न्यायालय या न्यायाधिकरण का गठन किय गया है? दूसरे यदि कोर्ट मार्शल द्वारा किसी प्रमाण के बिना कोई निर्णय ले लिया जाता है तो फिर उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ न्यायालय के लिए यह जाँच करने हेतु अपील स्वीकार करने का खुला विकल्प रहेगा कि क्या इसमें कोई साक्ष्य उपलब्ध है अथवा नहीं। निःसंदेह उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के लिए यह विचार करने का विकल्प नहीं होगा कि क्या साक्ष्य पर्याप्त हैं अथवा नहीं। यह मामला इन न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के बाहर का है। कोई साक्ष्य है या नहीं, यह मामला तो इन न्यायालयों द्वारा स्वीकार किया जा सकता है। उसी प्रकार से मैं यह कहना चाहता हूँ कि सशस्त्र सेना के किसी कर्मी के लिए इस बात की जाँच कराने हेतु विशेषाधिकार रिट जारी कराने के प्रयोजन से इन न्यायालयों में अपील करने का खुला विकल्प रहेगा कि उनके विरूद्ध कोर्ट मार्शल की कार्यवाही संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन की गई है या उनका स्वरूप मनमानीपूर्ण है। इसलिए, मेरी राय में रक्षा मंत्रालय द्वारा किसी भी कठिनाईयों को देखते हुए यह अनुच्छेद एक जरूरी अनुच्छेद है। इसमें वास्तव में बहुत अधिक नहीं कहा गया है। लेकिन इसके द्वारा पहले से प्रचलित नियम को सांविधिक मान्यता दी गई है और उसे सभी उच्चतम न्यायालयों द्वारा मान्यता देने की बात कही गई थी।

मुझे यह बताया गया है कि कुछ लोग सशस्त्र सेनाओं से संबंधित कानून के