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संबंध में कुछ कठिनाई का अनुभव करते हैं। यह कहाँ गया है कि सशस्त्र सेनाओं में बहुत सारे ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें वास्वत में सशस्त्र सैन्यकर्मी नहीं माना जा सकता बल्कि वे पृष्ठभूमि में काम करने वाले कर्मी होते हैं। मुझे ऐसे व्यक्तियों जो वास्तव में शस्त्र धारण करने वाले हों अथवा सशस्त्र सेना अधिनियम के अधीन पंजीकृत व्यक्तियों के बीच अंतर कर पाना बिल्कुल असंभव है, क्योंकि सशस्त्र सेनाओं में अनुशासन की जरूरत उतनी ही अधिक होती है जितनी कि ऐसे लोगों में अनुशासन बनाए रखने की जरूरत जो सशस्त्र सेना में शामिल नहीं हैं।
मेरे माननीय मित्र श्री सिद्धवा ने यह प्रश्न किया कि जब कभी सशस्त्र सेनाओं का कोई कर्मी कतिपय अपराध करता है, खतरनाक ड्राइविंग करते हुए या कोई इसकी प्रकार का कार्य करते हुए किसी व्यक्ति को मार देता है तो सामान्य तौर पर उसके विरुद्ध कोर्ट मार्शल के माध्यम से मुकदमा चलाया जाता है और आपराधिक मामलों के साधारण न्यायालयों के समक्ष उसके ऊपर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है। हाँ, मुझे नहीं मालूम लेकिन, मेरे मन में सशस्त्र सेनाओं के कर्मियों के बारे में कोई संशय नहीं है कि वह दोहरी क्षेत्राधिकार के विषयाधीन होते हैं। निःसंदेह वह सैन्य कानून से छूट भी नहीं मिली होती है। उदाहरण के लिए यदि कोई आदमी ऐसा अपराध करता है जो कि भारतीय दंड संहिता के साथ-साथ सशस्त्र सेना के अधीन एक अपराध हो, तो उस पर दोनों ही अधिनियमों के अधीन मुकदमा चलाया जाएगा। यदि सेना का कोई कर्मी इस प्रकार के अभियोजन से बच जाता है तो इसका कारण यह होता है कि लोगों ने उस मामले पर ध्यान नहीं दिया होगा। कानून का एक सामान्य सिद्धांत यह होता है कि कोई व्यक्ति सशस्त्र सेनाओं का एक कर्मी बन जाता है। इसलिए वह देश के सामान्य कानून के दायरे से बाहर नहीं हो जाता है। वह इसके दायरे में बना रहता है लेकिन उस उत्तरदेयता के अलावा उसे उस अधिनियम के अधीन भी आगे और उत्तरदेयता बरतनी पड़ती है जिसके अंतर्गत वह पंजीकृत है।
श्री महावीर त्यागीः क्या एक ही अपराध के लिए उसे दो सजा मिल सकती हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हाँ क्यों नहीं?
श्री आर.के. सिद्धवाः इसे स्पष्ट क्यों नहीं करते?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह बिल्कुल स्पष्ट है। भारतीय दंड संहिता की धारा 2 में कहा गया हैः ‘‘प्रत्येक व्यक्ति’’। प्रत्येक व्यक्ति का अर्थ है हर कोई, चाहे बड़ा हो या छोटा सशस्त्र हो या शस्त्र रहित।
श्री सभापतिः श्री टी.टी. कृष्णमाचारी क्या इसके बाद भी आप कुछ कहना चाहते हैं?
श्री टी.टी. कृष्णमाचारीः नहीं महोदय