अनुच्छेद 280क - Page 132

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नहीं होगी जब संसद द्वारा बनाए गए कानून में यह उपबंध किया जाता है कि इन मामलों के संबंध में राज्यों के विधानमंडल को भी कानून बनाने की शक्ति है अर्थात् यह मामले समवर्ती सूची में होते हैं। इसलिए, मेरे मित्र श्री कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तुत अनुच्छेद 59 के खंड (1) का उपखंड (ख) संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून के दायरे के बाहर नहीं है।

माननीय श्री के. संथानमः अनुच्छेद उन्हीं कानूनों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसे और आगे विस्तारित किया जा सकता है।

मानीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, इसे आगे और विस्तारित नहीं किया जा सकता है। उपखंड (ख) में संशोधन लाने की जरूरत इसलिए पड़ी कि केंद्र की कार्यपालक शक्ति न सिर्फ सूची 1 में अंतर्विष्ट मामलों तक विस्तारित हो सकती है, बल्कि सूची 3 में अंतर्विष्ट मामलों में भी उसका विस्तार किया जा सकता है और प्रारुप समिति की स्थिति यह है कि जब भी संसद द्वारा सूची 3 में अंतर्विष्ट किसी मामले के बारे में कोई कानून बनाया जाता है तो कानून केंद्र को कार्यपालक शक्ति, राष्ट्रपति को उस कानून को विस्तारित करने की शक्ति प्रदान करता है। इसलिए ये शब्द अनावश्यक हैं। श्री संथानम का संशोधन बिल्कुल ही अनावश्यक और संदर्भ से पहले हैं क्योंकि अनुच्छेद 60 में इस मुद्दे को शामिल किया जा चुका है।

(श्री संथानम का अनुच्छेद अस्वीकृत हुअ।)

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1 माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मेरे मित्र श्री कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तुत

खंड में वही पुरानी बातें हैं। यह भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अधीन प्रांतों के राज्यपाल के लिए जारी अनुदेशों के साधन में विद्यमान है।

अनुदेशों के साधन के पैराग्राफ 17 में कहा गया है_

विधेयकों को आरक्ष्ति किए जाने के मामले में अपनी शक्तियों के सामान्य उपयोग के बारे में कोई पूर्वाग्रह रखे बिना, हमारी सरकार किसी भी विधेयक या उसमें विनिर्दिष्ट किन्हीं खंडों को अपने नाम पर मंजूरी नहीं देगी बल्कि उसे अपने गवर्नर जनरल के विचारार्थ आरक्षित रखेगी।

(ख) कोई विधेयक जिसके विधि बन जाने पर उसकी राय में उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण होगा कि वह स्थान, जिसकी पूर्ति के लिए वह न्यायालय इस संविधान

* सी.ए.डी. खंड 10, 16 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 393-394