अनुच्छेद 280क - Page 133

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

द्वारा परिकल्पित है, संकटापन्न हो जाएगा, उस विधेयक का आरक्षित रखेगा।

यह खंड अनुदेशों का पुराना साधन है जिसे प्रारुप समिति ने चौथी अनुसूची में नकल कर लिया था जोकि उन्होंने शुरू करने का प्रस्ताव किया और यह पृष्ठ संख्या 368-369 पर संशोधनों के खंड II में पाया जाएगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि सभा मेरी सिफारिश के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि भाग एक में राज्यों के राज्यपालों के लिए अनुदेशों में अंतर्विष्ट किए जाने वाली ऐसी किसी अनुसूची को रखा जाना अनावश्यक है, यह तर्क मैंने दिया था और प्रारुप समिति ने यह महसूस किया कि किसी भी कीमत पर अनुदेशों का प्रस्तावित साधन का विशिष्ट भाग, पैरा 17 को संविधान में ही शामिल किया जाना चाहिए। अब महोदय, ऐसा करने के पीछे निम्नलिखित कारण हैंः

उच्च न्यायालयों को केंद्र के साथ-साथ प्रांतों के अधीन रखा गया है। जहाँ तक उच्च न्यायालय के संगठन और प्रादेशिक क्षेत्राधिकार का संबंध है वे निश्चय ही केंद्र के अधीन और प्रांतों को उच्च न्यायालय के प्रादेशिक क्षेत्राधिकार या उच्च न्यायालय की संरचना को बदलने की शक्ति प्राप्त नहीं है। लेकिन, वित्तीय क्षेत्राधिकार तथा सूची II में उल्लिखित किन्हीं मामलों से संबंधित क्षेत्राधिकार के मामले में नये संविधान के अधीन शक्ति राज्यों में निहित की गई है। उदाहरण के लिए ऐसा किसी राज्य विधान मंडल के लिए किसी वाद के मूल्य को बढ़ाकर उच्च न्यायालय के वित्तीय क्षेत्राधिकार में कमी करने हेतु कोई विधेयक पारित करना बिल्कुल संभव हो सकता है। वह एक तरीका हो सकता है जिसके माध्यम से राज्य उच्च न्यायालय के प्राधिकार को कम करने की स्थिति में होगा।

दूसरे सूची II में अंतर्विष्ट किन्हीं प्रविष्टियों के अधीन कोई उपाय किए जाने के मामले में उदाहरण के लिए ट्टण निरस्त करने या कोई और ऐसा मामला हो, प्रांतों के लिए यह कहने का खुला विकल्प होगा कि ऐसे किसी न्यायालय या बोर्ड द्वारा जारी की गई डिक्री अंतिम और पूर्ण होगी तथा उच्च न्यायालय का उस मामले में बिल्कुल ही क्षेत्राधिकार नहीं होगा।

मुझे ऐसा लगता है कि ऐसा कोई भी अधिनियम बनाया जाना उच्च न्यायालय के प्राधिकार जो कि इस संविधान के द्वारा उसे दिया गया है, का अवमूल्यन करने के बराबर है। इसलिए, ऐसा कोई कानून अंतिम रूप से बने उससे पूर्व यह महसूस किया गया कि राष्ट्रपति को यह जाँच करने का अवसर दिया जाना चाहिए कि ऐसे किसी कानून को प्रभावी होने की अनुमति दी जाए या फिर ऐसा कोई कानून उच्च न्यायालय के प्राधिकार का इतना अधिक अवमूल्यन कर दे कि उच्च न्यायालय महज एक संरचना बनकर रह जाए जिसमें कोई जान न हो।