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इसलिए इस तथ्य की उच्च न्यायालय की संविधान के द्वारा विधानमंडल और कार्यपालिका के बीच तथा नागरिक और नागरिक के बीच एक महत्वपूर्ण संस्था बनाने की मंशा व्यक्त की गई है, को ध्यान में रखते हुए मैं यह अनुरोध करता हूँ कि संविधान द्वारा सृजित किसी महत्वपूर्ण संस्था को बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति को इस प्रकार की शक्ति प्रदान करना अति आवश्यक है। उस प्रयोजनार्थ यह संशोधन पुनःस्थापित किया जा रहा है।
श्री एच.वी. कामथः भाषा को सरल बनाए जाने के मेरे सुझाव के बारे में क्या कहना है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इस चरण में किसी प्रारुप संशोधनों से विचार नहीं कर सकता हूँ।
श्री एच.वी. कामथः बिल्कुल ठीक। ऐसा बाद में कर लेना।
श्री सभापतिः मैं इस पर मत लूँगा।
(श्री टी.टी. कृष्णमाचारी का संशोधन।)
प्रस्ताव हैः
‘‘कि अनुच्छेद 175 में निम्नलिखित शर्तें जोड़ी जाएँः
परंतु यह और कि जिस विधेयक से, उसके विधि बन जाने पर, राज्यपाल की राय में उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण होगा कि वह स्थान, जिसकी पूर्ति के लिए वह न्यायालय इस संविधान द्वारा परिकल्पित है, संकटापत्र् हो जाएगा, उस विधेयक पर राज्यपाल अनुमति नहीं देंगे, किंतु उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखेंगे।’’
संशोधन स्वीकृत हुआ।
1 श्री सभापतिः डॉ. अम्बेडकर, क्या आप जवाब देना चाहेंगे?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः महोदय, इस अनुच्छेद को अनुच्छेद 8 के साथ पढ़ाया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 8 में कहा गया है -
‘‘इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत के राज्य क्षेत्र में प्रवृत्त सभी विधियाँ उस मात्रा तक शून्य होंगी जिस तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत है।’’
1 सी.ए.डी. खंड 10, 17 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 402