120 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस अनुच्छेद में कुल मिलाकर यह कहा गया है कि सभी कानून जो निंदा, अपवचन, बदनामी या किसी ऐसे अन्य मामले में जो भद्रता या नैतिकता के विरूद्ध अपराध हो या राज्य की सुरक्षा प्रभावित होती है, अनुच्छेद 8 से प्रभावित नहीं होंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि उनका प्रचालन जारी रहेगा। यदि ‘‘न्यायालय की अवमानना’’ शब्द नहीं होते, तो फिर न्यायालय की अवमानना से संबंधित किसी कानून के मामले में अनुच्छेद 8 लागू होगा और इसे समाप्त माना जाएगा। उस प्रकार की स्थिति को रोकने के लिए ही ‘‘न्यायालय की अवमानना’’ शब्द रखे गए हैं, और इसलिए इस संशोधन को स्वीकार किए जाने में कोई कठिनाई नहीं है।
अब जहाँ तक मेरे मित्र श्री संथानन द्वारा उठाए गए मुद्दे का संबंध है, यह बिल्कुल सही है कि मूल अधिकारों के संबंध में, ‘‘राज्य’’ शब्द का प्रयोग केंद्र के साथ-साथ प्रांतों सहित दोहरे अर्थ में प्रयोग किया जाता है। लेकिन मेरे विचार से उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस तथ्य के बावजूद किसी राज्य के द्वारा कानून बनाया जा सकता है और साथ ही केंद्र द्वारा भी कानून बनाया जा सकता है_ कुछ मदें जैसे कि निंदा, अपवचन, बदनामी या किसी ऐसे अन्य मामले में जो भद्रता या नैतिकता के विरुद्ध अपराध हो या राज्य की सुरक्षा प्रभावित होती है, जिनका उल्लेख किया गया है, ऐसे मामले हैं जिन्हें समवर्ती सूची में रखा गया है ताकि इन विषयों से संबंधित बनाए गए कानूनों के बीच काफी अधिक अंतर हो तो फिर केंद्र के लिए इस क्षेत्र में हस्तक्षेप करने और समानता बनाए रखने के लिए कोई कानून जोकि इस प्रयोजनार्थ वह जरूरी समझे, बनाने का खुला विकल्प होगा।
माननीय श्री के. संथानमः लेकिन न्यायालय की अवमानना को समवर्ती सूची या किसी अन्य सूची में शामिल नहीं किया गया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः ठीक है ऐसा कर दिया जाए।
श्री सभापतिः तो फिर मैं इन दोनों संशोधनों पर मत लूँगा। तथ्यात्मक रूप से पंडित ठाकुर दास भार्गव का संशोधन श्री कृष्णमाचारी का संशोधन नहीं है, यह बिल्कुल स्वतंत्र है और मैं उन्हें अलग-अलग रखूँगा। पहले मैं श्री कृष्णमाचारी पर मत लूँगा।
प्रस्ताव हैः
‘‘कि अनुच्छेद 13 के खंड (2) में, ‘बदनामी शब्द के बाद’ ‘न्यायालय की अवमानना’ शब्द अंतःस्थापित किए जाएँ।’’
संशोधन स्वीकृत हुआ।
पंडित भार्गव का संशोधन अस्वीकृत हुआ।
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