123
1 श्री सभापतिः अब मैं श्री कामथ द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर मत लूँगा। मेरे पास कोई विकल्प नहीं बचा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः उन्हें इसे वापस लेने के लिए कहा जा सकता है।
श्री सभापतिः मैंने उन्हें इसे प्रस्तुत नहीं करने का सुझाव दिया था। यह उन पर निर्भर है कि इसे वापस ले लें।
श्री एच. वी. कामथः मैं इसे वापस नहीं ले रहा हूँ।
श्री सभापतिः वह कह रहे हैं कि वह इसे वापस नहीं लेंगे।
प्रस्ताव हैः
‘‘कि संशोधन की सूची (खंड 1) के संशोधन संख्या 2 में, प्रस्तावित उददेशिका के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएः-
ईश्वर के नाम पर,
हम, भारत के लोग, भारत को एक [ सम्प्रभु समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य ] बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों कोः
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए,तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और (राष्ट्र की एकता और अखंडता) सुनिश्चित करने वाली बंधुता के लिए दृढसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
श्री एच.वी. कामथः मैं विभाजन चाहता हूँ।
पंडित गोविन्द मालवीयः मैं इस प्रश्न पर विभाजन चाहता हूँ।
मौलाना हसरत मोहालीः मैं इस प्रस्ताव पर विभाजन चाहता हूँ।
पंडित गोविन्द मालवीयः मैं विभाजन चाहता हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि हम इस देश और इसके लोगों के साथ अन्याय कर रहे हैं और मैं जानना चाहता हूँ कि इस मामले पर किसका क्या कहना है।
1 सी.ए.डी. खंड 10, 17 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 442