नए अनुच्छेद 302 क क क - Page 139

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सभा में हाथ उठाकर विभाजन कराया गयाः

हाँ ः 41

नहींः 68

संशोधन अस्वीकृत हुआ।

माननीय सदस्यः समाप्त करें, समाप्त करें।

1 श्री सभापतिः मैं यह समझता हूँ कि समापन को स्वीकार कर लिया गया है। अब मैं डॉ. अम्बेडकर को उत्तर दे के रहूँगा।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय, संशोधन में जो मुद्दा उठाया गया है या उठाया जा सकता है, वह प्रारुप समिति द्वारा प्रारुपित प्रस्तावना से अलग है, जोकि ‘‘किससे सभी शक्ति और प्राधिकार प्राप्त होगी’’ शब्दों को जोड़ने में अंतर्निहित है। इसलिए, प्रश्न यह है कि क्या प्रारुपति प्रस्तावना का कोई अर्थ बनता है जो कि सभा की सामान्य मंशा से अलग है अर्थात् यह संविधान लोगों से बना है और इसमें यह मान्यता दी गई है कि यह संविधान बनाने की संप्रभुत्ता लोगों में विहित है। मैं नहीं समझता कि इस मामले में कुछ भी विवाद है। मेरा यह कहना है कि इस संशोधन में जो कुछ सुझाया गया है, वह पहले से प्रारुप प्रस्तावना में है।

मौलाना हसरत मोहालीः तो फिर आप इसे स्वीकार क्यों नहीं कर लेते?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं विस्तृत जाँच के माध्यम से अभी यह दिखाने का प्रस्ताव करता हूँ कि मेरा तर्क सही है।

महोदय, यदि इस संशोधन का विश्लेषण किया जाए तो इसे तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक भाग घोषणापरक है। दूसरा भाग वर्णनात्मक है। तीसरा भाग वस्तुनिष्ठ और जरूरी है। अब मैं कह सकता हूँ कि पहला घोषणा परक भाग इस पर आधारित है। हम, भारत के लोग, अपनी इस संविधान सभा में आज इस तारीख, इस महीने इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। सभा के वे सदस्य जो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या यह प्रस्तावना यह कहती है अथवा नहीं कहती है कि यह संविधान और इस संविधान को बनाने की शक्ति और प्राधिकार और संप्रभुत्ता लोगों में विहित है, को संशोधन के अन्य भागों को मैंने पढ़ा है, अर्थात् शुरुआती शब्द, हम भारत के लोग अपनी संविधान सभा में इस तारीख को, इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित

* सी.ए.डी. खंड 10, 17 अक्तूबर, 1949, पृष्ठ 454456