नए अनुच्छेद 302 क क क - Page 141

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

में प्रतिनिधित्व किया था। (माननीय सदस्यगणः राज्यों की संख्या 13 थी) 13 राज्य थे। इसलिए, यदि 13 राज्यों के प्रतिनिधि फिलाडेल्फिया में छोटे से सम्मलेन में एकत्र होकर संविधान पारित कर सकते हैं और यह कह सकते हैं कि उन्होंने ऐसा लोगों के नाम पर, उनके प्राधिकार से और उनकी संप्रभुता के आधार पर किया। मैं स्वयं ही इस बात को समझ नहीं पा रहा हूँ, न कोई व्यक्ति जब तक वह परम पंडित न हो, ऐसी स्थिति में जब 292 लोगों की संख्या इस विशाल महाद्वीप का प्रतिनिधित्व कर रहे हों, तो अपनी प्रतिनिधि की हैसियत से यह क्यों नहीं कर सकते कि वे लोग इस देश के लोगों के नाम पर यह कार्य कर रहे हैं। (सुनिए, सुनिए)

मौलाना हसरत मोहानीः मैं ऐसा नहीं मानता हूँ। यह तो केवल एक समुदाय मात्र है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः वह एक अलग मामला है, मौलाना। मैं उस बारे में चर्चा नहीं कर सकता। इसलिए, जहाँ तक उस तर्क का संबंध है, मेरा यह कहना है कि किसी प्रकार का भय या आशंका रखने का कोई आधार नहीं है। इस सभा में किसी व्यक्ति की यह मंशा नहीं है कि इस संविधान में कुछ भी ऐसा होना चाहिए जिसमें थोड़ी सी भी ऐसी समानता न हो जिससे लगे कि इसे ब्रिटिश संसद की संप्रभुता से तैयार किया गया है। किसी की भी रत्ती भर ऐसी मंशा नहीं है। वस्तुतः हम इस संविधान के लागू होने से पूर्व की ब्रिटिश संसद की संप्रभुता के प्रत्येक पहलू की विद्यमानता को मिटाना चाहते हैं। इस बारे में इस सभा के किसी सदस्य और प्रारुप समिति के सदस्य के बीच किसी प्रकार का मतांतर नहीं है।

मैं मानता हूँ कि कुछ सदस्यों के मन में इस तथ्य को लेकर कतिपय भय या आशंका है कि इस वर्ष के प्रारंभ में संविधान सभा इस घोषणा में शरीक हो गई कि यह देश ब्रिटिश राष्ट्रमंडल से जुड़ा रहेगा और इस जुड़ाव के कारण किसी न किसी रूप में लोगों की संप्रभुता का हनन हुआ है। महोदय, मेरे विचार से यह एक सही दृष्टिकोण नहीं है क्योंकि प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र को किसी दूसरे देश के साथ संधि करने का अधिकार होना चाहिए क्योंकि जब कोई संप्रभु देश किसी संप्रभु देश के साथ संधि करता है, तो वह देश इस कारण कम संप्रभुता वाला देश नहीं हो जाता है। मैं सबसे

खराब उदाहरण दे रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों के मन में इस प्रकार का भय है (व्यवधान)।

श्रीमती पूर्णिमा बनर्जीः महोदय, क्या मैं ...

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरा यह कहना है कि इस प्रस्तावना सभा के प्रत्येक सदस्य की इच्छा को व्यक्त करती है कि इस संविधान की जड़, प्राधिकार,