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संप्रभुता लोगों में निहित होनी चाहिए। ऐसा ही है।
इसलिए, मैं संशोधन को सवीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ। मैं संशोधन के शब्द के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता हूँ। संभवतः संशोधन में इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया गया है, यदि मैं इसकी संरचना के बारे में कहूँ, तो यह प्रस्तावना जिसे हमने प्रारुपित किया है, में उपयुक्त नहीं बैठेगा और इसलिए मेरे विचार से इन दोनों आधारों पर प्रारुप समिति द्वारा प्रयुक्त की गई भाषा को बदलने का कोई औचित्य नहीं है।
{ संशोधन अस्वीकृत हुआ। प्रस्ताव स्वीकृत हुआ और प्रस्तावना संविधान में जोड़ा गया। }
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श्री सभापतिः हम लोग अब इस सत्र के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। मैं वास्तव में सभा को स्थगित करूँ, इस चरण में कतिपय चीजों को निपटाना होगा। एक प्रश्न संविधान के तीसरे पठन के लिए अगले सत्र के बारे में निर्णय लेना है और पिछले अवसरों पर सभा ने मुझे यह अनुमति दी थी कि मैं जब भी जरूरी समझूँ, सत्र को बुला सकता हूँ और इस बार भी मैं मानता हूँ कि सभा मुझे वही अनुमति देगी लेकिन मैं सत्यनारायण सिन्हा को उस आशय का एक औपचारिक संकल्प प्रस्तुत करने का अनुरोध करता हूँ।
माननीय श्री सत्यनारायण सिन्हाः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँः
‘‘सभा नवंम्बर, 1949 में उस तिथि तक स्थगित की जाती है, जिसे सभापति निर्धारित करे।’’
प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।’’
श्री सभापतिः मैं समझता हूँ कि हमने उन सभ संशोधनों को पूरा कर लिया है, जिनके बारे में हमारे पास सूचना दी गई थी और मुझे उनके बारे में कुछ और कहने की जरूरत नहीं है। अब हमने संविधान का दूसरा पठन समाप्त कर लिया है, इस सभा द्वारा हाल ही में पारित नियम 38 - आर के अधीन निहित की शक्तियों का प्रयोग करते हुए मैं प्रारुप समिति के पास संशोधनों के साथ प्रारुप संविधान भेजूँगा ताकि वह अनुच्छेदों को फिर से प्रारुपित कर सके। वाक्यचि“नों को संशोधित कर सके मार्जिनल नोटों को संशोधित और पूरा कर सके तथा संविधान में ऐसे औपचारिक या परिणामी या जरूरी संशोधनों की सिफारिश कर सके जो जरूरी हो। कार्य को पूरा करने के लिए यह