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अक्तूबर को समाप्त हुआ था। आज 14 नवंम्बर है। स्पष्ट है कि 395 अनुच्छेदों जो कि अब संविधान के भाग हैं की जाँच करने का भारी कार्य करने के लिए एक महीने का समय भी नहीं मिल पाया। जैसा कि मैंने कहा कि प्रारुप समिति के पास एक महीने का भी समय नहीं था, लेकिन यह वक्तव्य भी सही नहीं है, क्योंकि निमय 38 आर और अन्य नियमों के अनुसार, प्रारुप समिति को उनके द्वारा संशोधित प्रारुप संविधान सभा के सत्र प्रारंभ होने से पाँच दिन पूर्व पहले तक परिचालित करना आवश्यक था। वस्तुतः संविधान 6 नवंम्बर व्यवहार्थतः इस सत्र के आठ दिन पहले परिचालित कर दिया गया था। परिणामतः प्रारुप समिति के पास आठ दिनों से भी कम का समय था। आगे, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि प्रारुप समिति द्वारा प्रारुप संविधान समय पर पहुँचाने के लिए तैयार किए गए प्रारुप का मुद्रण करने के लिए प्रिंटर के पास कुछ दिन पहले देना पड़ा होगा, ताकि उसकी प्रतियाँ भिजवाने की तिथि से पहले प्राप्त हो सके। प्रिंटर को 4 नवंम्बर को प्रारुप दिया गया। यह देखने की बात है कि प्रिंटर के पास प्रारुप समिति द्वारा सुझाए गए संशोधनों या परिवर्तनों को शामिल करने के लिए सिर्फ एक दिन था। इस 395 अनुच्छेदों वाले इतने लंबे चौड़े दस्तावेज की विशुद्ध प्रतियाँ निकाल पाना प्रिंटर या प्रारुप समिति या प्रूफ संशोधनों के प्रभारी के लिए असंभव था।
5 तारीख को प्रिंटर द्वारा प्रारुप समिति को प्रस्तुत की गई प्रति में छूट गई भूल चूक की ओर ध्यान दिलाने के लिए इतना लंबा शुद्धिपत्र निकाला गया और इसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। यह देखना चाहिए कि प्रारुप समिति के पास इस कार्य को पूरा करने के लिए व्यवहारतः दस दिनों का ही समय था। समय की कमी के कारण ही सूची 2 में भी अभी शामिल किए गए संशोधनों की दूसरी सूची भी दी गई है। यदि प्रारुप समिति के पास अधिक समय रहता तो निश्चय ही वह शुद्धिपत्र या संशोधनों की अनुपूरक सूची जारी नहीं करती और मैं आशा करता हूँ सभा को शुद्धिपत्र और संशोधनों की दूसरी सूची देखने में जो कठिनाई होगी उसके लिए वह प्रारुप समिति जो इसके लिए जिम्मेदार हैं, को माफ कर देगी।
महोदय, मेरे लिए इस चरण में प्रारुप समिति द्वारा प्रारुप संविधान में प्रस्तावित संशोधनों और परिवर्तनों के स्वरूप पर चर्चा करना अनावश्यक है परिवर्तनों के स्वरूप को प्रतिवेदन के पैरा 2 में दर्शाया गया है। यह देखा जा सकता है कि प्रारुप समिति ने तीन प्रकार के परिवर्तन किए हैं। पहले परिवर्तन के अन्तर्गत तो अनुच्छेदों,
खंडों और उपखंडों की संख्या में फेर-बदल तथा वाक्य चि“्न में संशोधन किया गया है। ऐसा मुख्यतः इसलिए किया गया है क्योंकि यह महसूस किया गया कि संविधान सभा के अंतिम सत्र से उभर कर सामने आए अनुच्छेद बिखरे हुए रूपों में थे, और उन्हें शीर्ष या विषय-वस्तु के अधीन वर्गीकृत नहीं किया जा सका था। इसलिए प्रारुप समिति