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अनुच्छेदों का संशोधन
श्री सभापतिः डॉ. अम्बेडकर ने सभा के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है और सभा के समक्ष अभी प्रस्ताव यह है कि प्रारुप समिति द्वारा सिफारिश किए गए संशोधनों और प्रारुप संविधान पर विचार किया जाए। बिन्दु व्यवधान को दर्शाता है।
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श्री सभापतिः जैसा कि मैं समझता हूँ कि पंडित कुँजरू, आप जो औचित्य का प्रश्न उठा रहे हैं वह यह है कि इस सभा में प्रस्तावित अनुच्छेद का संशोधन इस सभा द्वारा लिए गए निर्णयों से अलग है, और यह लिए गए किसी निर्णय का परिण् ामी संशोधन नहीं हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बंबई जनरल)ः इस औचित्य के प्रश्न पर एकमात्र प्रश्न यह हो सकता है कि अनुच्छेद 365 में प्रारुप समिति द्वारा प्रस्तावित परिवर्तन परिणामी है या नहीं। प्रारुप समिति के निर्णय से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यह आवश्यक ही नहीं है बल्कि परिणामी भी है और इसका साधारण सा कारण यह है कि राज्यों के लिए निर्देश जारी किए जाने की शक्ति संघ सरकार को एक बार प्रदान कर दी जाती है कि कतिपय मामले में उसके द्वारा कतिपय तरीके से कार्रवाई की जा सके। मुझे ऐसा लगता है कि उन निर्देशों को पालन करने विफल रहने पर केंद्र को कार्रवाई करने की कोई शक्ति प्रदान नहीं करना व्यावहारिक तौर पर उन निर्देशों को नकारना है, जो संविधान में केंद्र को दिए जाने का प्रस्ताव है। प्रत्येक अधिकार के साथ उसका उपचार भी होना चाहिए। यदि कोई उपचार नहीं हो तो यह अधिकार सिर्फ कागजों पर बना रहेगा और इसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा, इसका उद्देश्य निरर्थक हो जाएगा और यह अपने आप नकारात्मक अधिकार होगा। यही कारण है कि प्रारुप समिति ने यह माना है कि ऐसा अनुच्छेद इस आधार पर आवश्यक है कि यह एक परिणामी अनुच्छेद है।
लेकिन महोदय मैं कुछ और कहना चाहता हूँ जो यह दिख पाएगा कि प्रारुप समिति वस्तुतः उन उपबंधों से अलग नहीं हटी है जो संविधान सभा के अंतिम सत्र में पारित किए गए थे। मैं अपने माननीय मित्र पंजिड कुँजरू से अनुच्छेद 280क, खंड (5) अनुच्छेद 306 ख का उल्लेख करने का अनुरोध करूँगा। अनुच्छेद 280 क, खंड (5) और अनुच्छेद 306 ख के मुख्य भाग के अंतिम अंश अब अनुच्छेद 365 के भाग हैं। इस अर्थ में अनुच्छेद 365 को प्रारुप समिति द्वारा प्रस्तावित नए अनुच्छेद के रू में नहीं माना जा सकता। यदि मेरे माननीय मित्र ....
डॉट्स व्यवधान को दर्शाता है।