134 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से अपूर्ण है। सभा में पहली अनुसूची के भाग ख में उल्लिखित राज्यों के मामले में जो कुछ भी किया हो, इसका यह अर्थ नहीं निकलता है कि वही उपबंध में पहली अनुसूची के भाग क में उल्लिखित राज्यों के संदर्भ में उन्हीं उपबंधों को निस्तारित कर दिया जाए। इसलिए, मेरा यह निवेदन है कि अनुच्छेद 365 की भाषा संविधान सभा के व्यक्त निर्णयों से कहीं आगे तक जाती है। पहली अनुसूची के भाग के और पहली अनुसूची के भाग ख में उल्लिखित राज्यों के बीच कतिपय अंतर बनाए रखा जाना चाहिए। उस अंतर को सिर्फ इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रारुप समिति की यह इच्छा है कि उन्हें आगे नहीं बढ़ाया जाए।
पंडित बालकृष्ण शर्माः (संयुक्त प्रांतः जनरल)ः क्या मै। कुछ अर्ज करूँ?
श्री सभापतिः क्या औचित्य का प्रश्न है?
पंडित बालकृष्ण शर्माः जी हाँ, महोदय !
श्री सभापतिः डॉ. अम्बेडकर जवाब दे चुके हैं।
माननीय डॉ. अम्बेडकरः मैं आपके ध्यान में मैं यह बात लाना चाहता हूँ कि वर्तमान भारत सरकार अधिनियम की धारा 126 में अंतर्विष्ट प्रावधान में भी यहीं प्रभाव है। जो गवर्नर जनरल को प्रांतों को निर्देश देने की शक्ति प्रदान करता है, और यदि गवर्नर जनरल को यह प्रतीत होता है कि ऐसे निर्देशों को प्रभावी नहीं बनाया गया है, तो वह अपने विवेक से गवर्नरों को ऐसा करने का आदेश जारी कर सकता है और गवर्नर को गवर्नर जनरल द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुरूप कार्यवाही करनी पड़ेगी। यदि, मैं यह कहूँ कि यह उपबंध बहुत आवश्यक है क्योंकि हम सभी जो युद्ध हो जाती है जब पंजाब सरकार ने भारत सरकार की खाद्य नीति को मानने से इनकार कर दिया था। किसी प्रांत द्वारा निर्देशों का पालन नहीं करके पूरी सरकार को पंगु बनाया जा सकता है, और भारत सरकार के पास उन निर्देशों को लागू करवाने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है। यह काफी महत्वपूर्ण मामला है और मैं यह कहना चाहता हूँ कि इसमें किया गया परिवर्तन न सिर्फ परिणामी है, बल्कि सरकार की स्थिरता के लिए भी आवश्यक है।
* * * * *
1 पंडित हृदय नाथ कुँजरूः महोदय मैं अपनी बात समाप्त करने से पूर्व एक और बात कहना चाहता हूँ कि प्रारुप समिति ने अनुच्छेद 365 में प्रयुक्त् की गई भाषा के औचित्य में बहुत से अनुच्छेदों का उल्लेख किया है। अब, इस अनुच्छेद 371 में उल्लिखित अनुच्छेद पुराने अनुच्छेद 306 ख के समान है। यदि उस अनुच्छेद का
1 सी.ए.डी अधिकारिक खंड X, 15 नवंबर 1949, पृष्ठ 519