136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1 श्री महावीर त्यागीः महोदय, मैं आशा करता हूँ कि सभापति से आशय संविधान सभा के सभापति से है न कि सरकार के राष्ट्रपति से।
श्री सभापतिः संघ के प्रेसीडंट (अध्यक्ष) को छोड़कर और कोई प्रेसीडेंट नहीं है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँः
‘‘कि अनुच्छेद के खंड (1) के उप-खंड (ख) में किसी कानून के अधीन अपराध शब्दों के स्थान पर किसी कानून के विरूद्ध अपराध शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँ।’’
श्री आर.के. सिघवाः यदि किसी शंका के मामले में उत्तर मिल जाए, तो इससे मदद मिलेगी।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, यदि मेरे मित्र श्री सिघवा धारा 366 के खंड (12) को देखें, तो वह पाएँगे कि अनुच्छेद 367 के उपखंड (3), जो संशोधन संख्या 562 क की विषयवस्तु है, में कुछ भी नया नहीं है। अनुच्छेद 366 एक परिभाषा वाला अनुच्छेद है अैर खंड (12) में यह परिभाषित करने का प्रयास किया गया है कि संविधान की दृष्टि से विदेशी राज्य का क्या आशय है। यह महसूस किया गया कि सभा द्वारा पारित अनुच्छेद 366 का खंड (12) अस्पष्ट और बड़ा ही लचीला है और इसलिए यह जरूरी है कि इसे अधिक स्पष्ट और व्यापक रूप प्रदान किया जाए।
परिमाणतः प्रारुप समिति ने यह सोचा कि अनुच्छेद 366 के खंड (12) का विलोप कर देना सर्वोत्तम रहेगा। ऐसा संशोधन संख्या 497 द्वारा किया गया है और अब इसे वर्तमान संशोधन संख्या 562 क द्वारा प्रतिस्थापित किये जाने का अनुरोध किया गया है। सभा के समक्ष प्रस्तुत प्रारुप में प्रमुख उपबंध यह था कि राष्ट्रपति के पास किसी आदेश के माध्यम से यह घोषणा करने का खुला विकल्प था कि भारत के संदर्भ में कतिपय देश, विदेशी राज्य नहीं है। अनुच्छेद 367 खंड (3) का मुख्य भाग बिल्कुल वैसा ही है। एकमात्र चीज, यह जोड़ी गई है कि संसद इस विषय पर कानून बना सकती है और ऐसा करते समय राष्ट्रपति के पास यह शक्ति निहित की जानी चाहिए कि वह किसी एक आदेश के माध्यम से यह घोषणा कर सकता है कि कौन से देश, एक विदेशी राज्य नहीं है। प्रारुप समिति ने आगे यह महसूस किया कि यदि उसमें ‘‘इन प्रयोजनार्थों जैसा कि आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाएँ’’ जैसे शब्द नहीं हो, तो इसका बहुत ही कठोर अर्थ निकलेगा, जो कि ऐसी शक्ति प्रदान करने के लिए वांछनीय नहीं होगा फिर राष्ट्रपति और
1 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 15 नवंबर 1949, पृष्ठ 550-551
डॉट्स व्यवधान को दर्शाता है।