अनुच्छेदों का संशोधन - Page 152

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संसद में दो अनिवार्य विकल्पों के ऊपर टकराव हो जाएगा या तो यह कहा जा सकता है। कि कोई देश, विदेशी देश है। अथवा यह कहा जा सकता है। कि कोई देश विदेशी राज्य नहीं है और इसका परिणाम यह होगा कि उस देश जिसके बारे में यह घोषणा की जाती है, कि वह विदेशी राज्य नहीं है, कि प्रजा स्वतः ही भारत के नागरिक हो जाएँगे और उन सभी अधिकारों के हकदार होंगे जो भारत के नागरिकों को इस संविधान के अधीन प्राप्त हैं। यह देश के हित में होगा कि जहाँ यह मान्यता देना वांछनीय हो कि कतिपय दूसरा देश विदेशी राज्य नहीं है, इसे ऐसे प्रयोजनों के लिए सीमित रखा जाए, ताकि आदेश में इसे विनिर्दिष्ट किया जा सके जिससे यह आदेश करते समय राष्ट्रपति अपनी स्थिति को अधिक समग्र रूप से स्पष्ट कर पाने में समर्थ हो और वह यह कह सके कि जहाँ हम यह घोषणा करते हैं कि कतिपय देश एक विदेशी राज्य नहीं है। और उस देश की प्रजा केवल कतिपय अधिकार और विशेषाधिकार की ही हकदार है, जो भारत के नागरिकों को मिले हुए हैं। उस प्रयोजनार्थ और उन सभी मामलों में, जिसके बारे में हमने सोचा कि अनुच्छेद 366 के खंड (12) को अमल में लाना और इसे अनुच्छेद 367 के खंड (3) के रूप में प्रस्तुत करना वांछनीय है और इसके लिए यह उपबंध किया गया है।

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1 श्री सभापतिः पंडित भार्गव ने यह सुझाव दिया है कि इस प्रश्न पर सदस्यों के बीच सहमति कायम होने के लिए अभी और 25 के बीच अभी भी समय है। यदि, वे लोग सहमत हो, तो ऐसा किया जा सकता है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बंबई जनरल)ः मेरे विचार से इस कठिनाई से आसानी से निकला जा सकता है यदि यह सभा 26 नवंबर को सत्र की समाप्ति से पूर्व भारत सरकार अधिनियम 1935 की धारा 290 को संशोधित करने वाला एक अधिनियम पारित कर दे जिसमें अन्य शक्तियों के अलावा गवर्नर जनरल को इस बात की भी अनुमति दी जा सके कि वह किसी प्रांत के नाम भी बदल सकता है एवं राष्ट्रपति अनुच्छेद 391 के अधीन कार्यवाही कर सके और अनुसूची में संशोधन कर सके जिससे प्रस्तावित भारत सरकार अधिनियम के अधीन गवर्नर जनरल द्वारा की गई कार्यवाही के अनुरूप कार्य किया जा सके। इसमें कुछ मिनटों का ही समय लगेगा। प्रारुप समिति या गृह विभाग अधिनियम 1935 की धारा 290 का संशोधन करने वाला विधेयक लाना संभव होगा। ऐसा विधेयक 26 जनवरी से पहले पारित किया जा सकता है।

श्री के. संथानमः हमारी कठिनाई नाम बदलने को लेकर आपत्ति करने की ही नहीं है, बल्कि ‘आर्यावर्त्त’ को लेकर है। उसी तरह, हम गवर्नर जनरल को इसका

1 सी.ए.डी. आधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 16 नवंबर 1949, पृष्ठ 574