अनुच्छेदों का संशोधन - Page 154

139

दौरान संदर्भ लिया है, पर चर्चा करना संभव नहीं है। इसलिए, मैं स्वयं को कहीं अधिक महत्वपूर्ण संशोधनों तक सीमित रखूँगा जिनके बारे में गंभीर आपत्तियाँ की गई हैं।

मैं अनुच्छेद 22 से शुरू करता हूँ। बहस सुनने पर मैंने यह पाया कि इस अनुच्छेद 22 और इसके उपबंधों जिन्हें प्रारुप समिति के संशोधनों द्वारा संशोधित किया गया है, को पूरी तरह से नहीं समझा गया है और मैं इसलिए संक्षेप में यह बताना चाहता हूँ कि प्रारुप समिति के संशोधनों द्वारा संशोधित अनुच्छेद में क्या कहा गया है। प्रारुप समिति द्वारा यथा संशोधित अनुच्छेद 22 के उपबंधों में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें हैं। सबसे पहले, निरोधी निरुद्ध के प्रत्येक मामले को विधि द्वारा प्राधिकृत किया जाना चाहिए। इसे कार्यपालिका की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता है।

दूसरे, निरोधी निरुद्ध के प्रत्येक मामले, जिसकी अवधि तीन महीने से अधिक हो, को न्यायिक बोर्ड के सामने रखा जाना चाहिए जब तक कि वह उन मामलों में से एक नहीं हो, जिसमें संसद खंड (7), उपखंड (क) के अधीन विधि द्वारा यह अभिनिर्धारित कर चुकी हो कि तीन महीने की अवधि से अधिक समय निरुद्ध रखने को प्राधिकृत करने हेतु इसे न्यायिक बोर्ड के समक्ष रखे जाने की जरूरत नहीं है।

तीसरे, प्रत्येक मामले में, चाहे उसे न्यायिक बोर्ड के समक्ष रखा जाना जरूरी हो या नहीं संसद ही निरूद्ध रखने की अधिकतम अवधि निर्धारित करेगी, ताकि किसी भी व्यक्ति, जिसे निरोधी निरुद्ध से संबंधित किसी कानून के अधीन निरुद्ध किया गया हो, को अनिश्चित काल तक के लिए निरूद्ध किया जा सके। निरुद्ध की अधिकतम अवधि हमेशा विद्यमान रहेगी, जिसे संसद को विधि के द्वारा निर्धारित करना पड़ेगा।

चौथे, उन मामलों में, जिसमें अनुच्छेद 22 के माध्यम से न्यायिक बोर्ड के समक्ष रखा जाना आवश्यक हो, बोर्ड द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया संसद द्वारा अभिनिर्धारित की जाएगी।

मैं चाहता हूँ कि सदस्यगण मूल अनुच्छेद 15 क के साथ प्रारुप समिति द्वारा यथसंशोधित इस नए अनुच्छेद 22 के उपबंधों पर विचार करें। यह देखा जा सकता है कि मूल अनुच्छेद 15 क की दो बातों के लिए आलोचना की जाती थी। एक तो यह था कि 4 (क) खंड (7) के अधीन निर्धारित की गई निरुद्ध की अधिकतम अवधि का विषय प्रतीत नहीं होता था। दूसरा दोष यह था कि निरुद्ध किए जाने के आधारों के बारे में सूचित करने की जरूरत 4(क) के अधीन निरुद्ध किए व्यक्ति पर लागू नहीं होता था। यह देखा जा सकता है कि अनुच्छेद 2 को वर्तमान (4) खंड में इन दो दोषों को दूर कर दिया गया है, जोकि 15 क के मूल प्रारुप में मौजूद था।