अनुच्छेदों का संशोधन - Page 155

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अनुच्छेद 22 में किए गए सुधार के बावजूद मुझे श्रीमती पूर्णिमा बनर्जी द्वारा की गई संयुक्ति से ऐसा लगता है कि उन्हें अभी भी अनुच्छेद के विरुद्ध कुछ शिकायतें हैं। कल के अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि निरोधी निरुद्ध विधि के प्राधिकर के बिना हो सकता है और दूसरे अभी भी ऐसे मामले हैं जिन्हें न्यायिक बोर्ड के समक्ष रख जाने की जरूरत नहीं है। उनकी पहली टिप्पणी के बारे में मैं आदरपूर्वक यह कहना चाहता हूँ कि गलत सोच रही है। यद्यपि निरोधी निरूद्ध सामान्य कानून के अधीन किए जाने वाले निरुद्ध से भिन्न है, फिर भी निरोधी निरुद्ध कानून के अधीन ही होना चाहिए। इसे कार्यपालिका की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। वह मुद्दे पूरी तहर से स्पष्ट है। उन्होंने जो दूसरी टिप्पणी की है कि नए अनुच्छेद 22 में कतिपय मामलों को न्यायिक बोर्ड के दायरे से बाहर रखा गया है, के बारे में स्वीकार करता हूँ कि उनका वह वक्तव्य सही है, किंतु मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि इसमें अंतर करना जरूरी हैं क्योंकि निरूद्ध किए जाने के कुछ मामले ऐसे हो सकते हैं जहाँ परिस्थितियाँ इतनी कठोर हो और परिणाम इतने खतरनाक कि ऐसे किसी विशेष व्यक्त को निरुद्ध किए जाने से संबंधित तथ्यों की जानकारी न्यायिक बोर्ड के सदस्यों को दिए जाने की अनुमति दिए जाने को वांछनीय नहीं माना जाए। इन तथ्यों को बताना राज्य के अस्तित्व के लिए ही बड़ा खतरा पैदा करता हो। निःसंदेह वह इस बात को महसूस करेगी कि न्यायिक बोर्ड के हस्तक्षेप के बिना तीन महीनों से अधिक अवधि के लिए निरूद्ध किए गए व्यक्तियों की अंतिम श्रेणी के संबंध में भी दो बाध्यकारी परिस्थितियाँ है। पहला तो यह कि ऐसे मामले को संसद द्वारा परिभाषित किया जाएगा। इस बारे में कार्यपालिका अजनाने तरीके से निर्णय नहीं ले सकता। जब संसद यह निर्धारित कर देगी कि किन मामलों को न्यायिक बोर्ड के समक्ष रखे जाने की जरूरत नहीं है, तभी उन मामलों में सरकार किसी व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय के लिए निरुद्ध करने का हकदार होगी। लेकिन यह महसूस करना अधिक महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक मामले चाहे उसे न्यायिक बोर्ड के समक्ष रखा जाना जरूरी हो अथवा नहीं निरुद्ध किए जाने की अधिकतम अवधि होगी जिसे कानून के द्वारा निर्धारित किया जाएगा।

मैं समझता हूँ कि इन संशोधनों के मामले में जो प्रारुप समिति ने अनुच्छेद 22 के बारे में मूल अनुच्छेद 15 (क) में निर्धारित उपबंधों में मौजूद कठोर उपबंधों की तुलना में काफी सुधार हुआ है। महोदय अनुच्छेद 22 के बारे में आवश्यक जानकारी देने के बाद मैं आगे अनुच्छेद 373 के बारे में बताना चाहता हूँ क्योंकि वह अनुच्छेद 22 से काफी नजदीकी से जुड़ा हुआ है।

अनुच्छेद 373 के विरुद्ध काफी आलोचना की गई है और कुछ सदस्यों ने तो संविधान में ऐसे अनुच्छेद सम्मिलित करने की वैधता या मर्यादा को भी चुनौती दी है।