अनुच्छेदों का संशोधन - Page 157

142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खंड (क) और अनुच्छेद 21 को पढ़ना चाहूँगा, क्योंकि इन दोनों अनुच्छेदों में अंतर्विष्ट उपबंधों को समुचित रूप से समझे बगैर किसी भी सदस्यों के लिए इसकी वांछनीयता को समझ पाना संभव नहीं हो पाएगा-मैं आगे अनुच्छेद 34 की जरूरत के बारे में भी बताऊँगा। अनुच्छेद 20 खंड (1) कहता हैः

‘‘कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्धदोष नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि अनुच्छेद 21 कहता है उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय जो अपराध के रूप में आरोपित है, किसी प्रवृत विधि का अतिक्रमण नहीं किया है’’

‘‘किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित

प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।’’

अब, यह स्पष्ट है कि जब कोई दंगा, विप्लव या विद्रोह या किसी क्षेत्र विशेष में राज्य के प्राधिकार को लोग नहीं माने, तो सैनिक शासन लगाया जाता है। सैन्य कानून का प्रभारी अधिकारी दो चीजें करता है। वह अपने आदेश द्वारा यह घोषणा करता है। कि, कतिपय कृत्य उसके प्राधिकार के विरूद्ध अपराध होंगे। और दूसरे वह अपने विचारण के लिए स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित करता है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि उपद्रवग्रस्त क्षेत्र के प्रभारी सैन्य कमांडर द्वारा अधिसूचित कोई कृत्य प्रभावी कानून द्वारा अधिनियमित अपराधों की श्रेणी में नहीं आता क्योंकि उस क्षेत्र का सैनय कमांडर कानून बनाने वाला व्यक्ति नहीं है। उसे यह घोषणा करने का प्राधिकार नहीं है कि कतिपय कृत्य अपराध है और दूसरे उसके द्वारा दिए गए आदेश का उल्लंघन प्रभावी कानून अर्थ के दायरे में कोई अपराध नहीं है क्योंकि प्रभावी कानून से आशय केवल उसी कानून से है जो कानून बनाने वाले प्राधिकारी द्वारा बनाया जाए। आगे प्रधान सैन्य कमांडर या सैन्य कमांडर द्वारा निर्धारित प्रक्रिया भी विधिसम्मत प्रक्रिया नहीं है क्योंकि उसे कानून बनाने का हक नहीं है। ये आदेश उसने अपने कार्य को पूरा करने अर्थात् कानून और व्यवस्था बहाल करने के उद्देश्य से दिए है। स्पष्ट रूप से यदि अनुच्छेद 20 खंड (1) और अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद में उल्लिखित ऐसी अर्हताएँ बिना रख दिया जाए तो देश में सैन्य शासन लगाना असंभव हो जाएगा तथा राज्य के लिए विद्रोह ग्रस्त क्षेत्र में तेजी से व्यवस्था लागू कर पाना असंभव हो जाएगा। इसलिए इस बात की अनुमति देने हेतु एक सकारात्मक वक्तव्य या सकारात्मक उपबंध करना आवश्यक है ताकि यह अनुमति दी जा सके कि अनुच्छेद 20 या अनुच्छेद 21 में अंतर्विष्ट किसी बात के रहते हुए भी प्रधान सैन्य कमांडर द्वारा की गई घोषणा के अनुरूप उसके आदेश के विरूद्ध किए गए कार्य को अपराध माना जाएगा। उसी तरह से उसके द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया माना जाएगा। मैं आशा करता हूँ कि यह स्पष्ट हो गया होगा कि यदि अनुच्छेद 34 हमारे संविधान में नहीं होता तो सैन्य शासन का