144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के मूल आधार को नहीं समझ पाए हैं। कार्य नियम बनाने का प्राधिकार प्रधानमंत्री में निहित करने की जहाँ बात है, मैं समझता हूँ कि इसे समुचित रूप में नहीं समझा गया है कि प्रभावी तौर पर ऐसा ही होगा जिसका साधारण सा कारण है, यद्यपि अनुच्छेद में राष्ट्रपति का नाम लिया गया है, किंतु राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह स्वीकार करने के लिए बाध्य हैं परिणामतः अनुच्छेद 77 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा जारी किए जाने वाले नियम वस्तुतः प्रधानमंत्री द्वारा और उसकी सलाह पर जारी किए जाएँगे।
अब महोदय, अनुच्छेद 77 की अनिवार्यता को समझने के लिए पहली चीज जरूरी है कि बात को महसूस किया जाए कि अनुच्छेद 77, अनुच्छेद 55 के साथ संबंधित है। वस्तुतः अनुच्छेद 77, अनुच्छेद 55 को ही आत्मसात करता है अनुच्छेद 53 एक अति आवश्क उपबंध करता है। संविधान के सामान्य उपबंधों के अनुसार संघ का सभी कार्यपालक प्राधिकार का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि सामान्य उपबंध के अधीन केंद्र संघ का कार्यपालक प्राधिकार का प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, राष्ट्रपति ऐसे प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत है और उसे ऐसा करने की अनुमति है, तो वह इसका प्रयोग निजी वैयक्तिक तौर पर करेगा। ऐसे किसी तर्क का निषेध करने के लिए अनुच्छेद 53 लाया गया है जो विशिष्ट तौर पर कहता है कि संघ का कार्यपालक प्राधिकार प्रयोग राष्ट्रपति द्वारा प्रत्यक्ष तौर पर अथवा अप्रत्यक्षतौर पर दूसरों के माध्यम से किया जाएगा। दूसरे शब्दों में अनुच्छेद 53 राष्ट्रपति को संविधान द्वारा उसमें निहित प्राधिकार का प्रयोग दूसरों को प्रत्यायोजित करने की अनुमति देता है। महोदय अब राष्ट्रपति को दूसरों के माध्यम से अपने अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति देने वाले अनुच्छेद 53 में अंतर्विष्ट इस विशिष्ट उपबंध को भी प्रभावी बनाया जाना चाहिए। अन्यथा अनुच्छेद 53 प्रभाव शून्य बनकर रह जाएगा। प्रश्न यह उठ सकता है कि इस बारे में एक वैधानिक उपबंध करना जरूरी क्यों है? जैसा कि अनुच्छेद 77 में प्रस्ताव किया गया है कि राष्ट्रपति कार्य नियम बना सकेगा। यह राष्ट्रपति पर ही क्यों नहीं छोड़ देना चाहिए, वह चाहे तो नियम बनाएँ और नहीं चाहे तो नियम नहीं बनाएँ? इसलिए अनुच्छेद 77 के संदर्भ में वैधानिक उपबंध करने की आवश्यकता के बारे में स्पष्टीकरण देना जरूरी है।
अनुच्छेद 77 की आलोचना करते समय दो बातों का ध्यान रख जाना चाहिए। पहला तो यह कि यदि राष्ट्रपति किसी अन्य अधिकारी अथवा किसी अन्य प्राधिकारी में अपना प्राधिकार प्रत्यायोजित करना चाहता है तो इस बात के कुछ प्रमाण होने चाहिए कि उसने यह प्रत्यायोजित किया है। यह किसी व्यक्ति जो विधि न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न उठा सकता है, के लिए सिद्ध करना संभव नहीं है कि राष्ट्रपति ने प्राधिकार प्रत्यायोजित किया है। दूसरे, यदि राष्ट्रपति अपने प्रत्यायोजन के माध्यम से अपने नाम पर कार्य करने