अनुच्छेदों का संशोधन - Page 160

145

के लिए व्यक्ति विशेष या सरकार के नाम पर प्राधिकार देने पर प्रस्ताव करता है, तो फिर व्यक्ति विशेष या अधिकार विशेष का नाम भी विशिष्ट तौर पर परिभाषित किया जाना चाहिए। अन्यथा विधि न्यायालय में बहुत सारे मुकदमें दायर कर दिए जाएँगे। जिनमें राष्ट्रपति द्वारा किए प्रत्यायोजित के संबंध में सवाल खड़े किए जाएँगे। संघ के राष्ट्रपति में निहित शक्तियों का व्यक्ति विशेष द्वारा प्रयोग किये जाने से संबंधित प्रश्न मुकद्में का मामला बन जाएगा। जिन लोगों को हमारे न्यायालयों में लंबित मुकदमों की जानकारी है, उन्हें शिवनाथ बनर्जी बनाम बंगाल सरकार का प्रसिद्ध मुकदमा याद होगा। भारत की रक्षा अधिनियम के अधीन, गवर्नर में उस अधिनियम के विरुद्ध अपराध करने वाले कतिपय व्यक्तियों को गिरफतार करने के लिए कतिपय व्यक्तियों को प्राधिकृत करने वाले व्यक्ति विशेष के पास यह कार्यवाही करने का प्राधिकार था और कलकत्ता उच्च न्यायालय स्वयं को संतुष्ट करने के लिए बंगाल सरकार से उनकी संतुष्टि के लिए यह सिद्ध करने को कहा था कि गिरफतार करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति विशेष ही व्यक्ति थे जिन्हें बंगाल सरकार ने प्राधिकृत करने की मंशा जताई थी। बंगाल सरकार को न्यायालय के समक्ष उसके निरीक्षण करने के लिए कार्य नियम रखने पड़े थे ताकि न्यायालय से संतुष्ट हो सके कि प्राधिकार का प्रयोग करने वाले वही व्यक्ति थे जो कार्य नियम में आशचित थे।

इस प्रकार की मुकदमेंबाजी टालने के लिए हमने इस कार्यवाही करने के प्राधिकार को प्रत्यायोजित करने के बारे में सोचा कि अनुच्छेद 77 जैसा उपबंध करना आवश्यक है। संबंधित प्रश्न अब समीक्षा का विषय नहीं रहा। सभा विद्यमान न्यायाधीशों के लिए कतिपय वेतनमान तथा भावी न्यायाधीशों के लिए कतिपय वेतनमान पहले ही पारित कर चुकी है। एकमात्र प्रश्न जिस पर विचार किया जाना है वह यह है कि जब किसी राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति की जाती है, तो क्या सरकार को उसका स्थानांतरण उस न्यायालय से किसी अन्य राज्य में उच्च न्यायालय में करने की अनुमति होगी? यदि हाँ, तो क्या इस स्थानांतरण के साथ किसी प्रकार का वित्तीय भत्ता भी दिया जाएगा, जिसमें उस स्थानान्तरण के कारण होने वाले वित्तीय घाटे की क्षतिपूर्ति हो सके? प्रारुप समिति का यह मानना है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में चूँकि सभी उच्च न्यायालय अब केंद्रीय सूची के विचाराधीन हैं, इसलिए पूरे भारत में सभी उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को आई.सी.एस. की भाँति एक एकल संवर्ग का माना जाना चाहिए तथा उनका एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण किया जाना चाहिए। यदि केंद्र के लिए यह शक्ति आरक्षित नहीं की जाती है, तो न्याय का प्रशासन चलाना बड़ा कठिन मामला बन सकता है। एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में किसी न्यायाधीश के स्थानांतरण से उसमें न्यायाधीशों की संख्या बढ़ सकती है तथा साथ ही बेहतर प्रतिभा का भी आगमन हो सकता है जो