158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1 श्री कुलाधर चलिहा (असमः जनरल)ः सभापति महोदय, सर्वप्रथम प्रारुप समिति तथा उससे भी अधिक डॉ. अम्बेडकर द्वारा तमाम कठिनाईयों के बावजूद यह आश्यर्चजनक संविधान तैयार करने में किए गए कार्य की सराहना करना जरूरी है।
हमें प्रारुप समिति के सदस्यों विशेषकर श्री मुंशी जो बहुत सारी व्यस्तताओं के बावजूद समझौता सूत्र पर पहुँचने के लिए सदैव प्रयासरत रहे, की सराहना करनी चाहिए और हम उनके कार्य तथा इस संविधान को सफल बनाने में महान योगदान देने वाले उन सभी मौन कर्मचारियों और कार्मिकों की भी सराहना करनी है महोदय, यह कहना जरूरी है कि यद्यपि हम भले ही सर्वोत्तम संविधान नहीं दे पाए हैं, फिर भी हमें यह कहना चाहिए कि भारत में व्याप्त दशाओं के अंतर्गत नहीं दे पाए हैं, फिर भी हमें यह कहना चाहिए कि भारत में व्याप्त दशाओं के अंतर्गत यह सर्वोत्तम संविधानों में से एक है जो हम तैयार कर सकते हैं। उन लोगों के सामने कई तथ्य लाए गए और उन तथ्यों को रखा गया जो जरूरी थे। यह कहा जाता है कि प्रारुप समिति के सदस्य स्वतंत्रता के संघर्ष में अग्रिम पंक्ति में नहीं थे लेकिन मैं सोचता हूँ कि इससे लाभ ही हुआ है कि उन लोगों ने इस पर भावना से परे होकर विचार किया है और वही चीज तैयार की है जो जरूरी थी। तीसरे पठन की चर्चा की शुरूआत में हमने श्री मुन्नीस्वामी पिल्लै को यह कहते सुना कि 60 मिलियन अछूत लोग इस संविधान से संतुष्ट हैं। यह एक वास्तव में महान योगदान है और यदि हम उन अछूतों, जिनकी उपेक्षा करने आए हैं, को संतुष्ट कर पाए हैं, तो मेरे विचार से हमने एक आश्चर्यजनक कार्य किया है। इसलिए मैं प्रारुप का तथ्य उन कर्मचारियों का जिन्होंने मौन रहकर कठिन परिश्रम से यह पुस्तक तैयार की है, जो हमारे समान हैं, की पूरी तरह से सराहना करता हूँ...
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* सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 18 नवंबर 1949, पृष्ठ 642