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1 श्री गोकुलभाई दौलतराम भट्टः जब संविधान का प्रारुप पहली बार सभा के समक्ष लाया गया तो मैंने यह सयुक्ति की कि यह फूलों का एक गुच्छा है जिसे विभिन्न स्थानों से तोड़कर एक साथ सजा दिया गया है। मैंने आगे देखा कि इसमें कुछेक कागज के फूल हैं, तो कुछ भाग में गुलाब के फूल हैं और साथ ही दुर्लभ चमेली के फूल भी हैं। इस प्रकार इसमें विभिन्न प्रकार और स्वरूप वाले फूल हैं। हमारे सामने फूलों का गुच्छा जो है, जिसे हमने स्वयं ही सजाया है और मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि हमने जो कुछ फूल सजाएँ हैं वे बहुत ही सुंदर और सुगंधित हैं। लेकिन हम सभी जानते हैं कि इस विश्व में हमें सभी प्रकार की चीजों की जरूरत पड़ती है क्योंकि यदि इसमें केवल गुलाब के फूल हों और कोई कांटा नहीं हो, तो मनुष्य का दिमाग फिर जाएगा क्योंकि वह अपनी जिंदगी में एक साथ इतनी खुशी को नहीं संभाल सकता। इसलिए, मेरा मानना है कि इस गुच्छे में फूलों के सुगंध की अधिकता को कम करने के लिए इसमें अन्य सामान डाले गए हैं...
मेरी यह उत्कृटता आशा है कि हमारे लोग देश के पुनःनिर्माण करने और नए संविधान का उपयोग करने के मामले में सही रास्ते पर चलेगा। मैं अपनी बात समाप्त करने से पूवर्ता प्रारुप समिति के सदस्यों और अन्य सदस्यों को इतने परिश्रम करने के लिए धन्यवाद देता हूँ।
* पंडित लक्ष्मीकांत मैत्राः प्रारुप समिति जिसमें हमारे कुछ बहुत अच्छे और अजाए हुए मित्रगण हैं द्वारा की गई सेवाओं का अनुमोदन करने के लिए मैं प्रशस्ति के समूह गान में प्रसन्नतापूर्वक शामिल होता हूद्द। मैं उन लोगों को उनकी उपलब्धि पर बधाई देता हूँ मैं संयुक्त सचिव, श्री मुखर्जी और अन्य कर्मचारियों द्वारा किए गए कार्य की भी सराहना करता हूँ जिन्होंने हमारे साथ सहयोग करके हमारे लिए यह संविधान तैयार करना संभव बनाया है।
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12 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड XX 11 18 नवंबर 1949, पृष्ठ 648-665218 नवंबर 1949, पृष्ठ 653