खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 176

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सर्वेंट और फिर रियासतों के दीवान तथा बाद में राज्य की परिषद् में कार्य करने का काफी अनुभव है। यद्यपि बाद में वह तस्वीर से हट से गए और डॉ. अम्बेडकर के आने के बाद संविधान के मामले में यहाँ सभा में भाग लेते नहीं दिखाई पड़े। फिर भी मुझे विश्वास है कि हम उनके द्वारा प्रदान की गई वृहत् सेवाओं को भूल नहीं सकते। सभा के प्रत्येक वर्ग ने उत्कृष्ट कार्य किया है। हमारे कुछ मित्रगण संशोधन प्रस्तुत करने के मामले में काफी ऊर्जावान रहे हैं- श्री कामथ श्री शिब्बनलाल सक्सेना, श्री सिधवा, और बाद में पंजाबराव देशमुख इस सूची में शामिल रहे हैं- उन सबने पूरे जोर-शोर के साथ अपना योगदान दिया है। यद्यपि हमारे मित्र प्रो. के.टी. शाह द्वारा प्रस्तुत किए गए बहुत सारे संशोधनों को स्वीकार नहीं कर पाए हैं, लेकिन उनकी सूझबूझ, बुद्धिमत्ता और क्षमता का मैं बड़ा प्रशंसक हूँ उन्होंने सभा के बाहर इस बात को स्वीकार किया जब हमने उनसे बातचीत की कि यद्यपि हम लोग फिर उनके संशोधनों को स्वीकार नहीं करने जा रहे हैं, पर फिर भी उन्होंने उन्हें प्रस्तुत किया क्योंकि वह अपने विचार हमारे समक्ष रखना चाहते थे। उन्होंने अच्छी खेल भावना के साथ पराजय को स्वीकार किया है। इसलिए मेरा मानना है कि यह संविधान हममें से प्रत्येक के द्वारा किया गया है और हम सबने यह कार्य काफी प्रसन्नता के साथ किया है। यदि इस दौरान किसी की हार हुई है तो बहुमत का सम्मान करते हुए अल्पमत वालों ने अपनी पराजय इस आशा के साथ स्वीकार की है कि भविष्य में बहुमत को अपने पक्ष में कर लेंगे...... महात्मा गांधी की शांतिपूर्ण और सत्यनिष्ठ आवाज हमारे दिलो में है। वह हमारे आदर्श और उन्हीं का आदर्श मानकर हम शांति के पथ पर तब तक आगे बढ़ते रहेंगें जब तक विश्व में शांति और समृद्धि का सर्वोच्च साम्राज्य नहीं कायम हो जाएगा। ईश्वर हमें शक्ति दे।

माननीय श्री बी. जी. खेर (बंबई जनरल)ः सभापति महोदय मै। इस अवसर पर कार्य के पूरा होने के प्रति अपना आभार व्यक्त किए बिना नही रहूँगा। तीन वर्ष पूर्व जब हमने इसे प्रारंभ किया था तो लगता था कि इसे पूरा कर पाना काफी दुष्कर है। मुझे याद है कि हमारी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई थी और इन तीन वर्षों में इतनी अधिक गहमागहमी और व्यस्तता का माहौल रहा है, जो कि इस कार्य को पूरा करने में हमें आमतौर पर तीन दशक लगते। बाहर की दुनिया में हुए परिवर्तनों के कारण हमारे संविधान में भी बदलाव लाना पड़ा है। इसलिए सबसे पहले मैं इस सभा को एक कठिन, पहेलीपूर्ण दुर्गम और ऐतिहासिक कार्य पूरा करने तथा आजाद भारत को एक संविधान प्रस्तुत करने के लिए बधाई देता हूँ। प्रत्येक व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि यह एक कठिन कार्य था। जिसे अद्वितीय तरीके से भारत ने

सी.ए.डी. आधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 18 नवंबर 1949, पृष्ठ 665