खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 179

164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1 महोदय, मैं इस टिप्पणी के साथ अपनी बात समाप्त करने जो रहा हूँ कि संविधान तो महज कागज का टुकड़ा है और वे अपने आप ही हमें हमारे आदर्शों की प्राप्ति नहीं करवा सकते। जिस भावना के साथ संविधान तैयार किया जाता है और जिस भावना के साथ उसका उपयोग किया जाता है, उससे एक राष्ट्र को अपने संविधान में अंतनिर्हित उद्देश्यों को हासिल करने में मदद मिलती है। महोदय, इसलिए इस अवसर पर जब हम अपना संविधान पारित करने जा रहे हैं, तो मैं सदस्यों को जो इस दस्तावेज पर 26 जनवरी को हस्ताक्षर करेंगे, से अनुरोध करना चाहता हूँ कि संविधान तैयार करके ही उनका कार्य पूरा नहीं हो जाता है, बल्कि उनका वास्तविक कार्य बाकी है। संविधान का उपयोग इस तरीके से करने की जिम्मेदारी उनकी है ताकि लोगों को वास्तविक आजादी, खुशी और समृद्धि प्राप्त करने मं मदद मिल सके।

महोदय, अब मैं आपकी अनुमति से केवल एक और बात का उल्लेख करूँगा। यह बात मुझे काफी प्रिय है। हमने अनुसूचित जातियों को बहुत कुछ दिया है हमने उन लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया है।

हमने संविधान में अनुच्छेद 355 रखा है जिसमें सेवाओं के मामले में उन लोगों को आश्वासन दिया गया है। हमने अनुच्छेद 16 के अधीन उन लोगों के लिए आरक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई है। लेकिन मुझे जब सरकार को उन लोगों के लिए पद आरक्षित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यदि हम वास्तव में महात्मा गाँधी के वर्ग-विहिन समाज की स्थापना करना चाहते हैं, तो हममें से प्रत्येक जो इस संविधान पर हस्ताक्षर करेगा को दृढ निश्चय बल्कि प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि वह दस वर्षों के भीतर शोषित वर्गों को अपने समकक्ष लाएँगे। वह लोग स्वयं के प्रति मिथ्या आचरण करेंगे - जो संविधान पर हस्ताक्षर तो करेंगे परंतु इसके सिद्धांतों के अनुरूप कार्य नहीं करेंगे।

* * * * *

2 श्री सभापतिः हम अभी चर्चा जारी रखेंगे।

श्रीमान श्री एच. वी. कामथ (सी.पी. बरारः जनरल)ः सभापति महोदय मैं डॉ. अम्बेडकर के द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव का सीमित और सशर्त समर्थन करने के लिए

खड़ा हुआ हूँ। महोदय, हम भारत के लोग अपनी लंबी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके हैं, जबकि शुरूआत काफी लंबी, कठिन और काफी संकट भरी रही है।

* * * * *

12 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड वही, 19 नवंबर, 1949, पृष्ठ 689 X 18 नवंबर 1949, पृष्ठ 682