खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 182

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1 माननीय श्री के. संथानम (मद्रासः जनरल)..... पीछे मुड़कर देखने पर मुझे लगता है कि यह तीन वर्षों का समय काफी लंबा नहीं रहा है। वस्तुतः इससे हम बेहतर संविधान का प्रारुप तैयार कर पाने में समर्थ हुए हैं, और यदि हमने एक वर्ष पूर्व इसे पूरा कर लिया होता, तो इतना बेहतर प्रारुप कर पाना संभव नहीं हो पाता। इस संविधान के बारे में बहुत सारी आलोचनाएँ की गई हैं। लेकिन इसे पूरा पढ़कर, यदि हम स्पष्टता तथा शुद्धता का मानदंड लागू करें, तो मेरे विचार से हमने वास्तव में बड़ा ही अच्छा संविधान बनाया है।

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2 सरदार भूपेंदर सिंह मान (पूर्वी पंजाबः सिक्ख)ः ..... तथापित, मैं महसूस करता हूँ कि यह संविधान या लिखित शब्द जिस पर अंततः गौर किया जाता है, की प्राण-विहिन मात्र नहीं है। समय गुजरने के साथ-साथ ही कतिपय परंपराएँ जो अधिक सटीक तथा वास्तविकता के कहीं अधिक निकट होगी जिसका स्वरूप अधिक गत्यात्मक होगा और महोदय मेरा यह मानना है कि यह अंततः लोगों की पसंद के अनुरूप होगा जो कि महत्वपूर्ण है और इसके अक्षर नहीं, बल्कि इसकी भावना का महत्व होगा और देश के लोगों को यहाँ प्रत्येक क्षेत्र में, प्रशासन के क्षेत्र में और समाज की आर्थिक संरचना में न्याय पाने का समान अवसर मिलेगा।

3 काजी सैय्यद करीमुद्दीन (सी. पी. और बरारः मुस्लिम)ः सभापति महोदय, मैं प्रारुप समिति को उसके द्वारा किए गए विलक्षण कार्य के लिए बधाई देता हूँ और मुझे भी नजीरूद्दीन अहमद को भी उनके द्वारा किए गए कठिन कार्य के लिए बधाई देनी है, जिसके लिए प्रारुप समिति ने धन्यवाद के एक भी शब्द नहीं कहे। मैं विशेषकर डॉ. अम्बेडकर का धन्यवाद करता हूँ तथा उनकी विलक्षण तर्क और इस संविधान का प्रारुप तैयार करने का जो कार्य किया है, उसके लिए उन्हें बधाई देता हूँ। मैं जानता हूँ कि उनके सामने बहुत अधिक मजबूरी थी और एक उदाहरण है मेरे द्वारा अवैध तलाशी - घरों और व्यक्तियों की तलाशी के संबंध में प्रस्तुत किया गया संशोधन - जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था तथा सभा ने भी उसे स्वीकार कर लिया था और इसके स्थगन के पश्चात् एक सप्ताह बाद उसे अस्वीकृत कर दिया गया........ 123 सी.ए.डी. आधिकारिक प्रतिवेदन, खंड वही 21 नवंबर 1949, पृष्ठ 723सी.ए.डी. आधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X X 19 नवंबर 1949, पृष्ठ 718 21 नवंबर 1949, पृष्ठ 723-724

4 वही पृष्ठ 730