खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 183

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

4 श्री शंकरराव देव (बंबईः जनरल) हमारे संविधान के ड ्र ा फ् टसमैनों की नियुक्ति करते समय हम संवैधानिक पंडितों, संवैधानिक वकीलों की विशुद्धता के प्रति जिज्ञासु थे और हमें वह सब पूरी तरह से मिलें। डा. अम्बेडकर और उनके साथी या प्रारूप समिति के उनके सहयोगी हमारी कृतज्ञता के पात्र हैं और मैं समझता ह ँ ू कि वे लोग किसी भी संविधान निर्माताओं, विश्व के किसी भी देश के किसी संविधान के प्रारूपकारों की तुलना में ठहर सकते हैं।

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1 सैय्यद मुहम्मद सादुल्ला (असमः मुस्लिम)ः महोदय, यह कहा जाता है कि कभी-कभी मौन रहना बोलने की अपेक्षा अधिक फायदेमंद रहता है। मेरी विनम्र राय यह है कि इस अवसर पर मौन रहना इस महती सभी के अनुरूप था-

मैं यहा ँ आज अपने दोहरे व्यक्तित्व को दर्शाए बगैर खड़ा नहीं रह सकता, अर्थात् इस महती सभी का सदस्य होने के साथ-साथ प्रारुप समिति का भी सदस्य होना उन सभी मित्रों जिन्होंने प्रारूप समिति का भी सदस्य होना उन सभी मित्रों जिन्होंने­ प्रारुप समिति के सदस्यों की पूरे दो वर्षों तक की गई कड़ी मेहनत और दुष्कर कार्य की सराहना करने की कृपा की है, को अपनी ओर से तथा साथ ही प्रारूप समिति के सदस्यों की ओर से धन्यवाद व्यक्त करने की लिए अपना सिर झुकाता ह ँ ू। मैं उन आलोचकों को भी अपनी ओर से धन्यवाद करना चाहता हूँ।

अपनी श्रेष्ठ बुद्धिमता से प्रारूप समिति के सदस्यों की कमियों की आलोचना की है। लेकिन, मुझे यह खेद के साथ कहना पड़ता है कि उन लोगों ने दोषपूर्ण परिप्रेक्ष्य में गलत दृष्टिकोण के साथ तथा उस दृष्टि से जिसका इसके साथ कोई संबंधा नहीं है, से इस मामले पर विचार किया है।

महोदय प्रारुप समिति कोई मुक्त एजेंसी नहीं थी। उनके सामने शुरु से ही विभिन्न तरीकों और परिस्थितियों की मजबूरी व्याप्त थी। हमें तो महज बच्चे का कपड़ा पहनाने के लिए कहा गया था और यह बच्चा और कोई नहीं उद्देश्यपूर्ण संकल्प था जिसे संविधान सभा ने पारित किया था। हमें यह बताया गया था कि संविधान उस उद्देश्यपरक संकल्प के चार कोनों के इर्द-गिर्द बने रहना चाहिए। महोदय, सबसे बड़ी बात, हमें जो कुछ भी करना था उस पर इस सभी द्वारा विचार किया जाना और स्वीकार

1 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 21 नवंबर 1949, पृष्ठ 732-733