खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 186

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अधान देश कभी सम्पन्नता प्राप्त नहीं कर सका था, उसके विपिरीत महार कानून से भारत वस्तुतः स्वर्ग बन जाएगा-

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श्री महबूब अली बेग साहिब (मद्रासः मुस्लिम)ः सभापति महोदय, आपने जिस तरीके से सभा की कार्यवाही संचालित की है, उसने शिकायत का कोई आधार ही नहीं छोड़ा है, उसके लिए यदि आपके प्रति अपना आभार व्यक्त करू ँ तो यह सराहना करने का महज औपचारिक या पारंपरिक तरीका नहीं होगा और मैं डा. अम्बेडकर को भी उत् कृ ष्ट योजना के साथ प्रारूप संविधान तैयार कराने के लिए बधाई देता हूँ। हममें से कुछ लोग जो प्रमुख दल के सदस्य नहीं थे, जो पूर्व में ही सभा के बाहर इन प्रश्नों पर निर्णय ले लिया करते थे कि प्रारूप समिति के विचारों की पुष्टि करनी है अथवा संशोधित करना है और वे अंतिम मध्यस्थ की भूमिका निभाया करते थे - हमारे जैसे लोग जो इस दल के सदस्य नहीं थे पूरी तरह असहाय हो जाते यदि आपने महोदय हमारा बचाव नहीं किया होता और इस मामले पर अपनी बात रखने की अनुमति दी जिसके लिए अपने निष्पक्ष ढंग से व्यवहार किया है। मैं आपका दिल से धान्यवाद करता ह ँ ू। डॉ. अम्बेडकर अपनी अभिव्यक्ति और विचारों की प्रखरता के मामले में अद्वितीय रहे हैं, वित्तीय मामलों सहित संवैधानिक समस्याओं पर उनकी पकड़ विलक्षण अनुपम, प्रबल और पूर्ण रही है। लेकिन महोदय आपकी तरह वह मुक्त एजेंट नहीं रहे हैं। अतः संविधान में मौजूद बुराइया ँ या दोश जो आज हमारे सामने रखे गए हैं, इस स्थिति में अंतर्निहित हैं और उनके लिए उन्हें वैयक्तिक तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

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1 श्री एस.एम. घोष (पश्चिमी बंगालः जनरल)ः सभा में मुझे मनु के बारे में कुछ सुनाई पड़ा है जिसके बारे में मैं समुचित रूप से नहीं समझ पा रहा ह ँ ू कि मनु किस बात के लिए जाने जाते हैं या फिर मनु का वास्तविक अर्थ क्या है? अम्बेडकर के बारे में बोलते हुए एक माननीय सदस्य ने प्रसन्न होकर कहा कि वह मनु नहीं है बल्कि महार है जिन्होंने हमें कानन दिया है। लेकिन यह ज्ञात नहीं है कि मनु ब्रा ह् मण था या महार जाति के थे। लेकिन मनु भारतीय मानस की अवधारणा का प्रतिनिधित्व करते हैं। - जिन्होंने मानवता के लिए एक आदर्श कानून बनाए थे। उस अर्थ में डॉ. अम्बेडकर को

1 सी.ए.डी., अधिकारिक प्रतिवेदन खंड ग, 21 नवंबर, 1949, पृष्ठ 741