176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हम अपने इतिहास पर गौर करें, तो यह मानना पड़ेगा कि यद्यपि एक समय इस देश में सुयोग्य शासकों के अधीन दूध और मधु की नदिया ँ बहती थीं और यद्यपि हमारे यहा ँ शासन रहा है जिसके लिए हमारे अंदर भी ललक बनी हुई है अर्थात् राम राज्य, लेकिन वह शासन एक उदार शासक का रहा था और जनप्रतिनिधियों द्वारा स्वयं के लिए कानून बनाए जाने की बात उसमें नहीं थी। महोदय, इसलिए मैं कहता ह ँ ू कि यदि आप वर्तमान की तुलना प्राचीन समय से भी करें, तो पाए ँ गे कि यह एक अद्वितीय अवसर है। मैं तो यहा ँ तक कह ँ ुगा कि भविष्य में भी इसके बराबर का अवसर नहीं होगा। इस संविधान में हम और सुधार कर सकते हैं और भविष्य में हम और भी बेहतर कार्य कर सकते हैं, किंतु इस संविधान की मौलिकता संभवतः किसी अन्य के लिए उपलब्धा नहीं होगी।
अंत में यद्यपि अपने आप में यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह संविधान दूसरे मामले में भी अद्वितीय है। महात्माजी के तरीके ने एक बार फिर सिद्धा कर दिया कि विरोधियों के प्रति दिखाई गई सद्भावना से सबसे प्रखर आलोचकों के मन को भी जीता जा सकता है और हमारे सामने उस उच्च आदर्श को यथार्थ में बदलने के उदाहरण मौजूद हैं, आजादी की प्राप्ति का श्रेय महात्माजी को जाता है और उसे संहिताबद्धा करने का श्रेय महात्माजी के प्रखर आलोचक अर्थात् हमारे महान संविधान के महान निर्माता, डॉ. अम्बेडकर को जाता है। महोदय, डॉ. केवल यही सभा नहीं बल्कि यह राष्ट ्र भी डॉ.अम्बेडकर का कृ तज्ञ है। उन्होंने और समिति के उनके सहयोगियों में पूरे विश्व में सर्वाधिक उपलब्धा अच्छी चीजें ढू ँ ढने और इस दश की आवश्यकता के अनुरूप उन्हें ढालने के लिए काफी मेहनत की है। जिस कुशलता के साथ उन लोगों ने इसका प्रारूप तैयार किया है और जिस कुशलता के साथ डॉ. अम्बेडकर ने इस प्रस्तुत किया है, केवल हम लोगों के द्वारा ही नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ी भी कृ तज्ञता के साथ याद रखेगी। मैं नहीं समझता कि इस संविधान को तैयार करने वाले ने यह दावा किया है कि यह अपने आप में पूर्ण है।
लेकिन इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने बहुत हद तक इसे परिपूर्ण बनाने के लिए सच्चा और निष्ठापूर्वक प्रयास किया है जितना कि वर्तमान दशा में संभव था -
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