178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चाहे कितने ही सुंदर ढंग से बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से पुस्तक मुद्रित की गई हो। इसका विकास और इसकी श्रीवशद्धि राष्ट ्र के चरित्र पर निर्भर करती है-यह भूमि राष्ट ्र का चरित्र है - जिस पर संविधान का बीज पनपता है। यदि मिट्टी चट्टानी है या वंजर है, तो निश्चय ही कितना भी अच्छा संविधान क्यों न हो, कितनी भी भव्य भाषा का इसमें प्रयोग किया गया हो, यह निश्चित है कि संविधान हमारे लक्ष्यों तक हमें नहीं पह ँ ुचा सकता। लेकिन, महोदय मुझे अपने देश के लोगों की सहज बुद्धिमत्ता पर भरोसा है मुझे कल की आने वाली पीढ़ी पर भी भरोसा है और हमने जो कुछ किया है, उसमें कुछ भी निराशाजनक नहीं है। मैं समझता ह ँ ू कि संविधान में दी गई किसी भी गारंटी या उसमें उल्लिखित त्रुटियों को दूर करने की बात से हम लक्ष्य तक नहीं पह ँ ुच पाएंगे। यह उन पर निर्भर करत ा है, जो संविधान का उपयोग करते हैं। यह इस पर निर्भर करता है कि हम सहनशीलता की भावना किस प्रकार विकसित करते हैं और यह संविधान या कानून के उपबंध पर निर्भर नहीं करता है। यह दलितों और जो लोग स्वयं को अल्पसंख्यक कहते हैं के प्रति प्रेम की भावना पर निर्भर करता है। हम संविधान में यह कानून बना सकते हैं कि छुआछूत की भावना लोगों के दिलों और घरो से मिटा दी गई है लेकिन उससे हम कहीं नहीं पह ँ ुच पाए ँ गे। आपके अंदर उन लोगों के प्रति प्रेम औ सहानुभूति होनी चाहिए जिसके पास कुछ नहीं है। यह संविधान या इसके अनुच्छेदों पर निर्भर नहीं करता है। यह हमारे अपने चरित्र, राष्ट ्र के रूप में शक्ति पर निर्भर करता है।
1 श्री गोपाल नारायण (संयुक्त प्रांतः जनरल)ः सभापति महोदय, गत तीन वर्षों के दौरान जब संविधान तैयार हो रहा था, मैं एक शांत और मौन दर्शक बना रहा। मैंने केवल दोबारा अपना मौन तोड़ा। लेकिन अंतिम और तीसरे पठन के चरण में मैं खुले तौर पर सादगी और साहस के साथ अपना विचार प्रकट करना चाहता ह ँ ू। सबसे पहले मैं डॉ. अम्बेडकर, प्रारूप समिति के अधयक्ष और सदस्यों को इतना विस्तश्त संविधान तैयार करने के लिए बधाई देता ह ँ ू जिसमें कुछ भी नहीं छोड़ा गया है। यहा ँ तक कि इसमें मूल्य नियंत्रण को भी शामिल किया गया है। मैं यह सोचता हॅू कि यदि उनके पास सतमय होता, तो उन लोगों ने इस संविधान में जीवन की संहिता भी निर्धारित कर दी होती। महोदय डॉ. अम्बेडकर के लिए एक बात कहना चाह ँ ूगा। इसमें कोई संशय नहीं है, कि उनका व्यक्तित्व सरसता और स्पष्टता से भरा हुआ है। उन्होंने अपने नाम बनाया है -
* * * * *
1 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 18 नवंबर 1949, पृष्ठ 803-804