खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 194

179

2 श्री अजीत प्रसाद जैन (संयुक्त प्रांतः जनरल)ः सभापति महोदय, जीवन में एक ही बार कोई राष्ट ्र स्वयं के लिए संविधान तैयार करने का निर्णय लेता है और इस संविधान को तैयार करने में हम लोगों ने जो भाग लिया है, उसके कारण ही हमें अपने ऊ पर गर्व होना चाहिए। भारत के इतिहास में, महानता तथा गौरव के क्षण आए हैं, महान साम्राज्यों के क्षण आए हैं और साम्राज्य विस्तार, उदारता और अच्छे राजाओं के क्षण आए हैं, लेकिन कभी भी हमारे यहा ँ ऐसा नहीं हुआ कि लोगों के लिए संविधान बनाए गए हो। आगे बढ़ते हुए यह जरूरी है कि हम डॉ. अम्बेडकर और प्रारूप समिति जो लगातार कई दिनों तक बैठते रहे और परिश्रम करते रहे, का धान्यवाद कर ें -

3 श्री एच.वी. कृष्णामूर्ति राव (मैसूर राज्य)ः सभापति महोदय, आपके सुयोग्य मार्गदर्शन में इस संविधान को तैयार करने के कार्य से मुझे जुड़ने का जो अवसर मिला उसे मैं एक बड़ा विशेषाधिकार मानता ह ँ ू और मैं आपके सामने प्रारुप समिति के अध्यक्ष और सदस्यों ने जो सौंपे गए कार्यों का इतने उत्कृष्ट ढंग से पूरा किया है, उसकी विनम्र प्रशंसा करने के लिए खड़ा हुआ ह ँ ू। महोदय, मैं यह कहना चाहता ह ँ ू कि जिस समय की कमी और भारी दबाव तथा परिस्थितियों के अंदर उन लोगों ने इस कार्य को पूरा किया है, कोई भी दूसरी समिति या कोई दूसरा निकाय हमें इससे बेहतर संविधान नहीं दे सकता था -

* * * * *

1 श्री थिरुमालारावः हम जिस भी स्थिति में हों, हमारे हाथों में एक संविधान है, जो उन व्यक्तियों के लिए सर्वोत्तम साधान का काम करेगा जो इसका उपयोग करेंगे, विधायक और मंत्री द्वारा इन कानूनों का चुना किया जाएगा। मेरा यह कहना कि अगले कुछ वर्षों के लिए अधिकतर यह प्रधानमंत्रियों पर निर्भर करेगा कि इस संविधान का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए। महोदय, हमने अपने राष्ट ्र चिर्निं के रूप में चक्र का सही चुनाव किया है क्योंकि यह अशोक काल का ऐतिहासिक अवशेष है। इस चक्र का अर्थ बताते हुए, पूर्वी सभ्यता के प्रख्यात विद्वान राइस डेविड ने कहा है कि यह चक्र सत्य और धर्म के सार्वभौमिक साम्राज्य के राजसी रथ के चक्का को घुमाते रहने के लिए आशचित है। कोई भी देश जो मौलिक नैतिक सिद्वांतों जिस पर वह टिका रहता

231 वही, पृष्ठ 805 वही, पृष्ठ 809 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 18 नवंबर 1949, पृष्ठ 820