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को सही ठहरा दिया है और उन्होंने स्पष्ट अंतर्दृष्टि, विचारों और भाषा की स्पष्टता के साथ इस कार्य को पूरा किया है। पूरी प्रक्रिया के दौरान, वह बहुत स्पष्ट रहे हैं। उन्होंन े हमेशा ही विरोधी के विचारों को समझने की कोशिश की है और उन्हें स्थान देने का प्रयत्न किया है तथा हमेशा ही उन्होंने अति स्पष्ट भाषा में अपने विचार प्रकट किए हैं। हम लोग उनके काफी आभारी हैं...
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2 श्री बी.पी. झुनझुनवाला (बिहारः जनरल)ः सभापति महोदय, इस संविधान की विभिन्न प्रकार से आलोचना की गई है और एक आलोचना में तो प्रारुप समिति पर यह आरोप लगाया है कि उन्होंने भारत सरकार अधिनियम 1935 को अंगीकार करने से अधिक कुछ भी नहीं किया है। यदि प्रारुप समिति की इस प्रकार से आलोचना की जाए, तो मैं यही कह ँ ूगा कि यह बड़ी ही कृ तज्ञतापूर्ण आलोचना है। दूसरी ओर मैं तो यह कहू ँ गा कि कोई भी अनुच्छेद स्वीकार करने पूर्व प्रारूप समिति ने विश्व के सभी संविधानों का अधययन करने और सैद्धांतिक दृष्टि से काफी सावधानी पूर्वक सभी संशोधनों पर गौर करने हेतु काफी मेहनत की है। यदि उन लोगों ने किन्हीं सिद्धांतो को स्वीकार नहीं किया है, तो इसका कारण यह नहीं है कि ये सिद्धांत भारत सरकार अधिनियम में मौजूद नहीं थे, यद्यपि वे सिद्धांत लागू होने योग्य और सही भी थे, किंतु वर्तमान दशा के अंदर व्यावहारिक तौर पर उन्हें लागू नहीं किया जा सकता था....
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1 श्री आलादी कृष्णास्वामी अ य् यरः (मद्रासः जनरल)ः महोदय संविधान को स्वीकार करने के लिए माननीय डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव के समर्थन में मैं सभा का कुछ समय लेना चाहता ह ँ ू। इस सभा द्वारा नियुक्त की गई विभिन्न समितियों की सिफारिश और प्रारुप समिति द्वारा प्रस्तुत मूल प्रारूप तथा बाद में प्रस्तुत संशोधित प्रारूप के अनुसरण में संविधान सभा ने यह संविधान तैयार किया है। मैं यह कहना चाहता ह ँ ू कि अंतिम रूप से तैयार संविधान वास्तव में उन्हीं उद्देश्यपरक संकल्पों की भावना को दर्शाता है जिसके आधार पर सभा ने अपना कार्य प्रारंभ किया था और संविधान की प्रस्तावना जो कि उद्देश्यपरक संकल्प पर मुख्य रूप से आधारित है....
1 2 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड वही, पृष्ठ 828-829 X 1 23 नवंबर 1949, पृष्ठ 840-841