खंड आठ प्रारुप विधान का तीसरा पठन - Page 197

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अपनी बात समाप्त करने से पूर्व यदि मैं अपने मित्र माननीय डॉ. अम्बेडकर ने जिस दक्षता और योग्यता के साथ यह संविधान तैयार किया है और प्रारुप समिति के अध्यक्ष के रूप में अथक परिश्रम किया है, के लिए प्रशंसा के शब्द नहीं कह ँ ूगा तो मैं अपने कर्तव्य में किल रह ँ ूगा बाद में मैं जानता ह ँ ू बाद मेरे मित्र श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने उनकी योग्यतापूर्वक सहायता की।

* * * * *

यदि मैं सर बी.एन. राव की सेवाओं और संयुक्त सचिव, श्री मुखर्जी और उनके सहयोगियों की अथक ऊ र्जा, धैर्य, योग्यता और मेहनत के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त नहीं करू ँ तो मैं अपने कर्तव्य में चूक करू ँ गा।

अंत में महोदय, मुझे क्षमा करेंगे, यदि मैं इस सभा में आपके कुछ कार्यां का संदर्भ द ँ ू क्योंकि इससे चापलूसी से बचा जा सकेगा। आपने इस देश की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया है और यह आपका सिरमौर कार्य है। आपसे ज्यादा आदर और प्यार किसी भी व्यक्ति को नहीं मिला है और आप इस सभा के मूल्यवान सभापति हैं, इस बात को आपने अपने कार्य से दर्शा दिया है। मैं विशेषकर आपका आभारी ह ँ ू क्योंकि मेरे खराब स्वास्थ्य के मद्देनजर आपने मुझे अपनी सीट पर बैठे-बैठे बोलने की अनुमति देने की कृ पा की है और मैं इस सभा के सदस्यों का भी आभारी ह ँ ू, जिन्होंने मुझे इस संबंध में सहयोग दिया है। मुझे इस बात से कुछ सांत्वना मिलती है कि इस सभा की विभिन्न समितियों और कार्य में मेरा थोड़ा बहुत उपयोग हो सका है (हँसी)....

1 श्री हैदर हुसैनः इस संविधान के विभिन्न उपबंधों की आलोचना करने की अवस्था नहीं आई है, न ही समय आया है। इस हॉल के बाहर और भीतर इसकी काफी आलोचना हो चुकी है। मेरा उत्तर तो यह है कि इस देश में उपलब्ध प्रतिभा द्वारा यही सर्वोत्तम संविधान प्रस्तुत किया जा सकता था और यदि हमें कुछ और अधिक उम्मीद करनी है, तो हमें अधिक बुद्धिमान और विद्वान व्यक्ति इस धारती पर पैदा करने पड़ेंगे यदि निकट भविष्य में ऐसा करना संभव हो। तथापि, मैं यह कहने के लिए बाधय ह ँ ू कि यह जो हमारे सामने संविधान मौजूद है, उस पर राष् ट्र गर्व कर सकता है। तो फिर, हमें बिना किसी बौद्धिक आपत्ति के इसे अपना पूर्ण समर्थन देने की शपथ लेनी चाहिए। हम राजनीतिक आजादी प्राप्त कर चुके हैं और देश का आर्थिक उत्थान करने में आज समय की जरूरत है क्योंकि इसी एक मात्र उद्देश्य के लिए स्वतंत्रता का संघर्ष किया गया था। इस कार्य में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष से भी अधिक परिश्रम, अधिक कार्य करने

1 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 1 23 नवंबर 1949, पृष्ठ 842