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संशोधित करना वांछनीय है, जोकि इस मामले के परिणामस्वरूप जरूरी है तथा फेडरल न्यायालय के क्षेत्राधिकार और शक्तियों से संबंधित भारत सरकार अधिनियम में व्याप्त कुछ विसंगतियों को दूर करने के लिए जरूरी है। जैसा कि मैं कह चुका हूँ कि खंड 3 भारत सरकार अधिनियम की धाराएँ 208 और 218 जोकि प्रिवी काउंसिल और फेडरल न्यायालय से आने वाली अपीलों तथा भारत के बाहर के न्यायालयों से आने वाली अपीलों से संबंधित हैं, को समाप्त करता है। ये दोनों ही परिवर्तन परिणामी हैं।
धारा 205, जो कि फेडरल न्यायालय के अपीली क्षेत्राधिकार से संबंधित है और धारा 214 जो भारत के बाहर न्यायालयों पर फेडरल न्यायालय के क्षेत्राधिकार से संबंधित है, में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया गया है।
इसलिए, इन परिणामी तथा अन्य आवश्यक संशोधनों के माध्यम से फेडरल न्यायालय के क्षेत्राधिकार को पूर्ण तथा स्वतंत्र बनाए जाने का प्रस्ताव किया गया है। निस्संदेह यह उपाय एक अंतरिम उपाय ही है क्योंकि ये शक्तियाँ केवल 26 जनवरी, 1950 जब संविधान लागू हो जाएगा, तक की बनी रहेंगी। 26 जनवरी, 1950 को फेडरल न्यायालय की शक्तियाँ संविधान में निर्धारित उपबंधों के अनुरूप तय होंगी।
महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ।
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खंड 2
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, खंड 3 में यह अंतर्विष्ट है, यदि मेरे मित्र इसे पढ़ें। खंड 3 के उपखंड (2) के लिए फेडरल न्यायालय का उपबंध किया गया है। इसलिए खंड 2 में ‘‘(फेडरल न्यायालय के अलावा)’’ शब्द मौजूद हैं।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः इस सूची में यह खंड 2 में है और मेरा संशोधन केवल इस पर ही लागू होता है।
श्री सभापतिः वर्तमान में आप इसे छोड़ सकते हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं संशोधन को स्वीकार नहीं करता हूँ। यह बिल्कुल अनावश्यक है।
श्री बी. दास (उड़ीसाः जनरल)ः मैं प्रस्ताव करता हूँः
‘‘खंड 2 के उपखंड (1) में ‘या अन्यथा’ शब्दों का लोप किया जाए।’’