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भी हो। कतिपय अध्यायों में वही विशेषाधिकार या अधिकार रखे गए हैं, हमने अब तक प्राप्त कर लिए हैं। संविधान में केवल उन्हीं अधिकारों को अंतर्विष्ट और मंजूरी दी जाती है, जो प्राप्त हो चुके हैं। यही मूल अवधारणा है, जिस पर मैं जोर देना चाहता ह ँ ू क्योंकि अन्यथा यदि हमने संविधान में कतिपय ऐसे अधिकार अंतर्निष्ट कर दिए हैं जो अब तक प्राप्त नहीं हुए हैं, तो फिर हम, दश की एक मिथ्या, भ्रामक और ढोंगपूर्णं तस्वीर प्रस्तुत करेंगे और सबसे बड़ी बात फिर वह संविधान कार्य नहीं कर सकेगा। इसलिए, संविधान का सीमित प्रयोजन होता है और फिर भी संविधान में कतिपय खराब उपबंध होते हुए भी जैसे कि संपत्ति को मूलाधिकार के रूप में संरक्षित करने का उपबंध यह देश में समाजवाद लाने से नहीं रोकेगा जैसा कि श्री संथानम ने कहा है...
@ श्री धरनीधर बसु मतारी (असमः जनरल)ः सभापति महोदय, मैं यह समझता हूँ कि मैं अपने गृह राज्य असम लौटने से पूर्व डॉ. अम्बेडकर तथा प्रारुप समिति को इस संविधान का निर्माण करने की जो महान उपलब्धि हासिल की है, उसके लिए अपनी शुभकामना देना चाहता हूँ। मैं समझता हूँ मेरा यह कहना गलत नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास आलोचना करने के लिए कोइ न कोई आधार मौजूद है अथवा उनकी कोई शिकायत रह गई है। संविधान सभी दृष्टि से प्रत्येक वर्ग को संतुष्ट नहीं करता है और वह कर भी नहीं सकता है, लेकिन अखिल भारतीय दृष्टिकोण से हर चीज को देखें तो संविधान निराशजनक भी नहीं है बल्कि वास्तव में विभाजन के बाद की कठिन परिस्थितियों में इससे बढि़या संविधान तैयार कर पाना संभव भी नहीं था। संविधान में, इसके अनुच्छेदों में, इसकी अनुसूचियों के कुछ ठंढे ढंग से मुद्रित कर दिया गया है, उसका ही महत्व नहीं होता। निश्चय वह भावना महत्वपूर्ण होती है जिसके साथ संविधान को लागू भी किया जाता है। सभी वर्गों के लोग ईमानदारी और स्वार्थरहित होकर सहयोग करें, तो मुझे पूरा विश्वास है कि भारत सही दिशा में प्रगति करेगा।
1 श्री अरि बहादुर गुरूंगः सभापति महोदय, मैं प्रारुप समिति के अध्यक्ष और सदस्यों को इस विलक्षण कार्य को सफलतापूर्वक अंजाम देने के लिए बधाई देने के क्रम में स्वयं को अन्य सहयोगियों के साथ सहबद्ध करता हूँ।
मुझे बहुत कम बातें कहनी हैं। सबसे पहले तो यह कि संविधान की यह आलोचना कि इसमें समाजवाद की स्थापना के लिए उपबंध नहीं किया गया है, उतनी
1 सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X 1 23 नवंबर 1949, पृष्ठ 856
@ वही पृष्ठ 867