200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जनरल को कठिन स्थिति में डाल रहे हैं। इसलिए यह नही सोचें कि इस चरण में इसे स्वीकार करना तार्किक होगा, भले ही सुझाव कितना अच्छा क्यों न हो।
मेरे मित्र, श्री सिधवा के सुझाव पर आते है। मुझे लगता है कि इस अनुच्छेद की मंशा तथा नए संविधान में अंतर्विष्ट उपबंधों को लेकर उनके मन में पूरी तरह से गलतफहमी भरी हुई है। वह संसद के बारे में बोलते है तथा इसे जरूरी बनाना चाहते हैं कि गवर्नर जनरल द्वारा दिए आदेश को तीन दिनों के भीतर संसद के समक्ष रखा जाए। लगता है सिधवा इस तथ्य को भूल गए हैं कि जब वे संसद का उल्लेख करते हैं, तो उसका अर्थ उस विधानमंडल से है जो 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आएगा।
उस तिथि को गवर्नर जनरल शब्द गायब हो जाएगा और यह धारा 290 तथा उपखंड (ड) जिसे मैं इस तरीके से पुनःस्थापित करने की कोशिश कर रहा हूँ भी समाप्त हो जाएँगे। 26 जनवरी को दूसरी कानूनी पुस्तिका आ जाएगी तथा नए संविधान के अनुच्छेद 3 में अंतर्विष्ट उपबंध प्रचलन में आ जाएँगे। मुझे खेद के साथ कहना पडता है कि उन्होंने इस बात पर्याप्त रूप से घ्यान नही दिया है, जो मैं बताना चाह रहा हूँ।
श्री आर.के. सिधवाः गवर्नर जनरल द्वरा की गई किसी भी कार्रवाई को राष्ट्रपति मानने के लिए बाघ्य होगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे लगता है कि ये दोनों ही सुझाव अव्यावहारिक हैं सामान्य सिद्धांत के रूप में कि संसद को इसमें लाना चाहिए अथवा नही, हमें दो मामलो पर विचार करना होगा।
एक तो यह कि कुछ प्रातों की यह सामान्य इच्छा है कि भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधीन जिन नामों से उन प्रातों को बुलाया जाता रहा है, उसे वे लोग पसंद करते हैं और वे लोग संविधान लागू होने की तिथि से अपने प्रातों के नाम वैसा रखना चाहेंगे जिन्हें वह बहुत अच्छा मानते हैं, जब पिछली बार उस मामले पर चर्चा हो रही थी, तो संविधान सभा में यह महसूस किया कि कुछ प्रांतों के नाम उनकी अपनी राय में अच्छा नहीं है, तो उन प्रांतों की सामान्य इच्छा विचार करने हेतु उपयुक्त हैं और इस संविधान के लागू होने से पूर्व गवर्नर जनरल के लिए एक उपबंध बनाकर दिया जाना चाहिए जिसके बारे में वह प्रांतों की इच्छा पूरी करने के लिए जो भी कार्रवाई जरूरी समझें, करें। अतः मुझे लगता है कि ऐसा उपबंध जरूरी है।
कतिपय आशंका व्यक्त की गई है कि कुछ प्रांत गवर्नर जनरल को ऐसे नाम सुझा सकते हैं, जो अन्य प्रांतों की राय में रखा जाना संभव नहीं हो सकता है और परिणामतः जिन नामों को इस सभा द्वारा खारिज किया जा चुका है अथवा निरानुमोदन किया जा