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चुका है, इस संविधान सभा की जानकारी के बिना या संबंधित प्रांतीय विधानमंडलों की सहमति के बिना नए प्रांतों को इन नामों से नवाजा जा सकता है। मुझे लगता है कि इस प्रकार का सुझाव इस विधेयक द्वारा यथासंशोधित धारा 290 को बहुत अधिक तरजीह देने के कारण आया है क्योंकि धारा 290 के अधीन गवर्नर जनरल को इस मामले में पूर्ण विवेकाधिकार है और वह प्रांतीय सरकार द्वारा दिए गए सुझाव या यदि मैं श्री पटाश्कर के संशोधन को स्वीकार कर लूँ तो विधानमंडल की राय पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य नहीं है। वह कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है और उसे कार्रवाई करने की सलाह देने का प्राधिकार केवल केंद्रीय कैबिनेट को है। धारा 290 के अधीन केवल इतना जरूरी है कि प्रांतीय सरकार के विचार को जाना जाए। उसका अर्थ यह नहीं है कि गवर्नर जनरल सुझाए गए किसी नाम को स्वीकार करने के लिए बाध्य है। मुझे पूरा विश्वास है कि केंद्रीय कार्यपालिका द्वारा तथा गवर्नर जनरल द्वारा धारा 290 के प्रस्तावित संशोधन के अधीन कोई कार्रवाई करने का निर्णय लिए जाने से पूर्व इस सभा में हुई चर्चा तथा संयुक्त प्रांत के नाम संबंध में प्रो. सक्सेना द्वारा दिए गए सुझाव के संबंध में इस सभा द्वारा व्यक्त की गई राय पर निश्चय ही विचार किया जाएगा।
श्री सभापतिः मैं अब संशोधनों पर मत लूँगा। श्री नजरुद्दीन अहमद क्या आप अपने संशोधनों को मतदान के लिए रखना चाहते हैं? यह केवल वाक्य चि“न का मामला है?
श्री नजरुद्दीन अहमदः मैं इसे प्रारुप समिति पर छोड़ता हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह एक गलत संशोधन है।
[ खंड 3, प्रस्तावना और शीर्षक स्वीकृत हुए तथा विधेयक में जोड़े गए। ]
$माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय मैं प्रस्ताव करता हूँ कि सभा द्वारा प्रस्तुत भारत सरकार अधिनियम, 1935 का और संशोधन करने वाले विधेयक पारित किया जाए।
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प्रस्ताव स्वीकृत हुआ
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+ सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड 25 नवंबर 1949, पृष्ठ 937