202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
* श्री फैंक्र एन्थोनी (सी.पी. और बरारः जनरल)ः सभापति महोदय, सबसे पहले तो मैं आपको धन्यवाद करना चाहता हूँ कि आपने सभा की बराबर अध्यक्षता करते हुए हमेशा ही लोगों के प्रति विनम्रता दिखाई है तथा बड़े शालीन तरीके से विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। प्रारुप समिति ने इस कठिन और जिम्मेदारी से भरे कर्तव्य का जिस तरीके से निर्वहन किया है, उसके लिए उसे समुचित शुभकामना पहले ही दी जा चुकी है। मैं अपने माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर जो मेरे दाहिने भाग में बैठे हुए हैं, को बहुत संक्षेप में शुभकामना देना चाहूँगा। मुझे नहीं लगता कि हममें से कोई भी वास्तव में काम की मात्रा का और इस विस्तृत कार्य जो कि किसी भी रूप में आसान दस्तावेज नहीं है, को पूरा करने में कितना ध्यान देना पड़ेगा, के बारे में पहले से अंदाजा लगा सकता है। जहाँ विभिन्न अवसरों पर, मैं उनकी बात से भले ही सहमत नहीं हुआ हूँ। लेकिन मौलिक विषयों पर जो उनकी पकड़ है तथा विस्तार और स्पष्टता के साथ जो वह लगातार मामले को प्रस्तुत करते है, उनको सुनने में मुझे काफी आनंद आता था। यह कहा गया है कि इस संविधान के बारे में मिश्रित प्रतिक्रिया मिली है। यह तो अवश्यंभावी है कि इसके बारे में प्रतिक्रिया मिश्रित मिलनी थी क्योंकि यह आवश्यक तौर पर एक मिश्रित संविधान है। इसका चरित्र समन्वय वाला है। मेरा मानना है कि यह एक तरफ आदर्शवाद और दूसरी तरफ यथार्थवाद के बीच मिलन है। मैं जानता हूँ कि मेरे कुछ अति आदर्शवादी मित्रों ने इसकी आलोचना की है। वे लोग चाहते होंगे कि इस समन्वय के स्थान पर बाईबिल के दस नियम या दस आदेशों के स्वरूप वाला कुछ वैसा होना चाहिए था जो पूरी तरह से आदर्शवादी विचारधारा हो जो प्रशासनिक यथार्थों तथा राजनीतिक कठिनाईयों के पहले प्रभाव में ही शिथिल हो जाता तथा दम तोड़ देता। जैसा कि मैं कहा चुका हूँ मेरा मानना है कि हमने संविधान को काफी आकर्षक और आकांक्षापूर्ण दस्तावेज बनाने हेतु पर्याप्त रूप से आदर्शवादी सिद्धांत उधार लिए हैं और दूसरी ओर इसे हमने पूरी तरह से भौतिक और सांसारिक विचारों पर आधारित नहीं रखा ताकि यह बोझिल न हो जाए अथवा किसी तरह से इससे प्रेरणादायी तत्व न निकल जाएँ। महोदय, मैं यह महसूस करता हूँ कि यह एक पूर्ण दस्तावेज नहीं है, पर साथ ही मैं यह भी मानता हूँ कि इसे तैयार करते समय सभी लोकतांत्रिक निर्माण की प्रक्रियाओं का पालन किया है, हमने लोकतांत्रिक कारकों के सम्पूर्ण क्षेत्र को परखा है। इसके अंतर्गत सावधानीपूर्वक विचार किए गए हैं बहुत ही गहरे विश्लेषण हुए हैंः बहस और जवाबी बहस हुई है, बड़े ही तीव्र विवाद हुए हैं और एक बार तो हमने सोचा कि विवाद इतना अधिक तीव्र हो चुका था कि हम उस अवस्था में पहुँच सकते थे जिसे रोमवासी आर्ग्यूमेंटम एंड बैक्युलम अर्थात मामले को वस्तुतः शारीरिक शक्ति के आधार
* सी.ए.डी. अधिकारिक प्रतिवेदन, खंड X, 25 नवंबर 1949, पृष्ठ 938-939