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हमने इन सभी व्यक्तियों की सहायता ली, लेकिन महोदय, इन सभी मित्रों के कार्यों का कोई मतलब नहीं रह जाता यदि आप जैसे एक शिष्ट और सम्मानित व्यक्ति का साथ नहीं मिला होता, आप जब किसी व्यक्ति को आगे बोलने से रोकना चाहते थे, तो आप उस व्यक्ति की ओर नजर घुमा देते थेः धैर्य के साथ इंतजार करते थे कि वह व्यक्ति आपको देख ले - ऐसा नहीं था, कि आप उस व्यक्ति को अपनी ओर देखने के लिए नहीं कहते थे _ आप बड़ी ही सज्जनता से वक्ता को अपनी बात समाप्त करने का इशारा कर देते थे और हममें जो कुछ व्यक्ति जब विद्रोही तेवर अपना लेता, अशांत होकर शोरगुल मचाने लगता, तो आप बस मुस्करा पड़ते थे ताकि वह अपने रवैये को शांत कर ले।
मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमने एक बड़ी चीज हासिल की है, हमने जो हासिल किया है, उसे कम कर आंकना ठीक नहीं है। पर्दे के पीछे बहुत कुछ किया गया है, लेकिन इस सभा के बहुमत दल के लोगों के पार्टी के प्रति अनुशासन और कवायद के कारण इन विचार-विमर्शों की अंतिम परिणति सुखद नहीं रही है।
मैं आप सबका इस बड़े कार्य को पूरा करने के लिए धन्यवाद करता हूँ और इसके लिए बधाई देता हूँ।
मेरे लिए यह कहना शेष रह गया है कि हमारे लिए शुरुआत करने के लिए यह संविधान काफी अच्छा है। इसके अनुरूप कार्य करते रहें, इसके आधार पर कार्य करें, इसका प्रयोग करें आप अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य करते रहें, और जैसे कि 19वीं सदी के सत्तर के दशक में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस में जब मताधिकार की व्यवस्था आगे बढ़ रही थी, तो एक महान सांसद ने कहा था कि स्वयं को यह कहते रहे, हमें अपने मालिकों को शिक्षित करते रहना चाहिए।’’
$ श्री जगत नारायण लालाः अंत में, मैं सभापति तथा प्रारुप समिति के सदस्यों विशेषकर डॉ. अम्बेकर, श्री मुंशी और कृष्णमाचारी के साथ साथ अन्य लोगों के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करना चाहता हूँ।
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$$ श्री टी.टी. कृष्णमाचारीः सभापति महोदय सबसे पहले मैं प्रारुप समिति की ओर से इस माननीय सभा के सदस्यों को धन्यवाद देता हूँ इनमें से सभी ने व्यावहारिक तौर पर प्रारुप समिति के कार्य की सराहना की है, भले ही इस संविधान के कतिपय उपबंधों के बारे में उनके विचार कुछ भी रहे हों - और महोदय, उनमें से किसी एक ने नहीं बल्कि सभी मेरे नेताओं ने जिनमें से अधिकतर सत्तर वर्ष से अधिक