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210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हुई, उससे मैं इतना आह्लादित महसूस कर रहा हूँ उसके लिए अपनी कृतज्ञता पूरी तरह से व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं संविधान सभा महज यही आकांक्षा लेकर आया था कि अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा कर सकूँ। मुझे इसका दूर-दूर तक आभास नहीं था कि मुझे इससे अधिक जिम्मेदारी संभालने को कहा जाएगा। इसलिए सभा ने जब मुझे प्रारुप समिति में निर्वाचित किया तो मुझे आश्यर्च हुआ। जब मुझे इसका अध्यक्ष बनाया गया तो मुझे और भी अधिक आश्चर्य हुआ। प्रारुप समिति में मेरी तुलना में कहीं बड़े, बेहतर और अधिक सक्षम लोग मौजूद थे। जैसे कि मेरे मित्र सर अलादी कृष्णमाचारी अय्यर। मैं संविधान सभा और प्रारुप समिति का आभारी हूँ कि मुझमें इतना अधिक भरोसा और विश्वास किया तथा अपना साधन चुनकर देश की सेवा करने का यह अवसर प्रदान किया। (हँसी)।

जो श्रेय मुझे दिया गया है, वास्तव में मैं उसका हकदार हूँ ही नहीं। इसका श्रेय अंशतः संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार सर बी.एन. राव जिन्होंने प्रारुप-समिति के विचारार्थ संविधान का कच्चा प्रारुप तैयार किया था। थोड़ा श्रेय प्रारुप समिति के सदस्यों को जाना चाहिए जिन्होंने जैसा कि मैं बता चुका हूँ कि 141 दिनों की बैठक की है तथा जिनकी निपुणता के बिना विभिन्न प्रकार के विचारों को सहने की तथा समायोजित करने का नया सूत्र तलाश पाना और क्षमता विकसित कर पाना तथा संविधान को तैयार कर पाने का कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न नहीं हो पाता। संविधान के मुख्य ड्राफटसमैन का श्रेय श्री एस.एन. मुखर्जी को अधिक मिलना चाहिए। अति जटिल प्रस्तावों को अति सरल और स्पष्ट कानूनी रूप देने की उनकी योग्यता तथा कठिन परिश्रम करने की क्षमता दुर्लभ है। सभा के लिए वह एक संपत्ति रहे हैं। उनकी सहायता के बिना, संविधान को अंतिम रूप देने में इस सभा को और कई वर्ष लगते। मैं यह उल्लेख करना नहीं भूलूँगा कि श्री मुखर्जी के अंदर कार्य करने वाले कर्मचारियों ने कितनी मेहनत की है और कितना अधिक कार्य किया है, कभी-कभी तो वे लोग मध्यरात्रि के बाद तक कार्य करते रहे हैं। मैं उन लोगों का उनके द्वारा किए गए प्रयासों तथा उनके सहयोग के लिए धन्यवाद देना चाहता हूँ (हँसी)।

प्रारुप-समिति का कार्य काफी कठिन हो जाता यदि यह संविधान सभा लोगों की महज भीड़ होती बिना सीमेंट के पट्टीदार सड़कों की तरह जिसमें काला पत्थर और सफेद पत्थर इधर-उधर बिखर जाते है।, जिसमें प्रत्येक सदस्य या प्रत्येक समूह मनमानापूर्ण व्यवहार करता। ऐसी स्थिति में अफरा-तफरी का माहोल होता है। इस अफरा-तफरी की संभावना सभा में अंदर कांग्रेस पार्टी के विद्यमान रहने से बिल्कुल क्षीण हो गई, उस पार्टी ने सभा की कार्यवाहियों के दौरान व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखा। कांग्रेस पार्टी के अनुशासन के कारण ही प्रारुप-समिति सभा के अंदर संविधान पारित करवा