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सकी क्योंकि उसे इसका पक्का पता था कि प्रत्येक अनुच्छेद और प्रत्येक संशोधन का क्या हश्र होना है। इसलिए, कांग्रेस पार्टी सभा के अंदर प्रारुप संविधान के सुचारु रूप से पारित कराने हेतु सभी श्रेय के हकदार हैं।

इस संविधान सभा की कार्यवाही काफी नीरस हो जाती, यदि सभी सदस्यों में दलीय अनुशासन के नियम का पूरी तरह से पालन किया होता। दलीय अनुशासन पूरी कठोरता के साथ लागू होता, तो यह सभा के बस हाँ में हाँ मिलाने वाले सदस्यों की सभा बनाकर रह जाती। सौभाग्यवश, इसमें विद्रोही सदस्य भी रहे हैं। इनमें श्री कामल, डॉ. पी0एस0 देशमुख, श्री सिघवा, प्रो. के.टी. शाह और पंडित हृदय नाथ कुँजरू के नाम उल्लेखनीय है। उन लोगों ने जो मुद्दे उठाए, उनमें से अधिकतर वैचारिक थे। उन लोगों के सुझाव स्वीकार करने के लिए मैं तैयार नहीं हुआ, इससे उनके सुझावों का मुल्य नहीं घट जाता है या फिर सभा की कार्यवाही जीवत बनाने में उन लोगों ने सेवा दी है, वह कम नहीं हो जाती। मैं उन लोगों का आभारी हूँ। उन लोगों के कारण ही मुझे संविधान में अंतर्निहित सिद्धांतों की व्याख्या करने का अवसर मिला जो कि संविधान को पारित किए जाने के महज यांत्रिक कार्य की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण बात थी।

अंत में, मैं सभापति महोदय आपका धन्यवाद करना चाहता हूँ कि आपने इस प्रकार से इस सभा की कार्यवाही का संचालन किया है।

संविधान सभा के सदस्यों के प्रति आपने जो शिष्टता दिखाई है तथा उनकी माँग पर जो विचार किया है उसे इस सभा की कार्यवाहियों में भाग लेने वाले सदस्य कभी नहीं भूल पाएँगे। ऐसे अवसर आए नव प्रारुप समिति के संशोधनों को उनके पूर्णतः तकनीकी स्वरूप के आधार पर अस्वीकृत करने की माँग की गई। वे क्षण मेरे लिए काफी चिंता के क्षण थे। इसलिए मैं आपका विशेष तौर पर आभारी हूँ कि आपने संविधान निर्माण के कार्य को कानूनी आधारों पर बाधित करने की अनुमति नहीं देकर उसके उद्देश्य को विफल होने से बचा लिया।

संविधान के पक्ष में मेरे मित्रों सर अलादी कृष्णमाचारी अय्यर और श्री टी. टी. कृष्णमाचारी यथासंभव बहुत कुछ कह चुके हैं। इसलिए मैं संविधान के गुणों के बारे में चर्चा नहीं करूँगा। क्योंकि मेरा मानना है, कि कितना अच्छा भी संविधान क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले खराब होंगे, तो वह संविधान खराब हो जाएगा। उसी प्रकार कोई संविधान खराब क्यों न हो यदि अच्छे लोगों के हाथ में उसे लागू करने की जिम्मेदारी हो, तो वह अच्छा हो जाएगा। संविधान का सही ढंग से कार्य कर पाना पूरी तरह से संविधान के स्वरूप पर ही निर्भर नहीं करता है। संविधान में तो राज्यों के अंगों जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का निर्धारण किया जा सकता है। राज्य