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‘‘हम प्रत्येक पीढ़ी को एक विशिष्ट राष्ट्र मान सकते हैं, उन्हें बहुमत की इच्छा के अनुरूप ऐसे अधिकार दिए जा सकते हैं जिससे वे लोग बंधे हुए हैं, लेकिन उनसे आने वाली पीढ़ी और किसी दूसरे देश के निवासी नहीं बंधे होते हैं।’’
एक अन्य जगह पर उन्होंने कहा है-
‘‘यह विचार कि राष्ट्र के उपयोग के लिए स्थापित की गई संस्थाओं को छुआ नहीं जा सकता या उन्हें संशोधित नहीं किया जा सकता था अपने उद्देश्यों के बारे में बताने के लिए भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उन्हें ये अधिकार उदारतापूर्वक प्रदान किए गए हैं ताकि जनता का विश्वास उनमें बना रहे, संभवतः राजतंत्र के दुरूपयोग से बचने के लिए एक शुभकामना से भरा उपबंध हो सकता है किंतु यह स्वयं राष्ट्र के लिए सर्वाधिक असंगत उपबंध है, फिर भी हमारे वकील और लोकतंत्र के पुजारी सामान्य तौर पर इस सिद्धांत को स्वीकार करते हैं और यह मानते हैं कि पूर्ववर्ती पीढि़याँ इस पृथ्वी पर हमसे अधिक स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करती रही होंगी, उन्हें हमारे ऊपर ऐसे कानून थोपने का अधिकार था, जिन्हें हम ही बदल सकते तथा उसी प्रकार से हम ऐसे कानून बना सकते हैं तथा भावी पीढि़यों पर उन्हें थोप सकते हैं, जोकि वे ढोते रहे, जिन्हें परिवर्तित करने का अधिकार नहीं होगा, तो फिर ठीक है तो यह पृथ्वी केवल मृत व्यक्तियों के लिए ही होगी जीवित व्यक्तियों के लिए नहीं।’’
मैं यह मानता हूँ कि जेफरसन ने जो कहा, वह केवल सच ही नहीं, पूर्ण सच है। इसके बारे में कोई प्रश्न खड़ा नहीं कर सकता। यदि जेफरसन द्वारा निधारित सिद्धांत से संविधान सभा अलग हटती, तो उसके लिए निश्चय उसे दोषी ठहराया जाता या फिर निंदा की जाती। लेकिन मैं पूछता हूँ क्या ऐसा है? इसके बिल्कुल विपरीत होता। संविधान के संशोधन किए जाने से संबंधित उपबंध की जाँच करें। यथा लोगों को इस संविधान में संशोधित करने के अधिकार से वंचित करके इसे अंतिम और अचूक मानने से बची है जैसा कि कनाडा में किया गया है या फिर संविधान को संशोधित करने को इतने असाधरण निबंधन और शर्तों के विषयाधीन नहीं बनाया है, जैसा कि अमेरिका या आस्ट्रेलिया में किया गया है, बल्कि संविधान को संशोधित करने की प्रक्रिया बहुत ही सहज रखी है। मैं संविधान के किसी भी आलोचकों को यह सिद्ध करने की चुनौती देता हूँ कि विश्व की किसी भी संविधान सभा ने इन परिस्थितियों के अधीन जिसमें यह देश रहा है, संविधान के संशोधन के लिए इतनी सहज प्रक्रिया या उपबंध किया हो। जो लोग संविधान से असंतुष्ट हैं, उन्हें सिर्फ 2/3 बहुमत प्राप्त करने की जरूरत है और यदि मताधिकार के आधार पर निर्वाचन के सिद्धांत पर अपने पक्ष में वे संसद के अंदर दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा सकते, तो संविधान के प्रति असंतोष को आम जनता का समर्थन हासिल होना नहीं माना जा सकता।