218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बनाने में समर्थ हो जाए। देश की जीवनपर्याप्त सेवा करने वाले महान व्यक्तियों के प्रति आभारी रहने में कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन आभार व्यक्त करने की सीमा है। जैसा कि आयरिश राष्ट्रभक्त डेनियल ओ, कर्नल ने ठीक ही कहा है कोई भी व्यक्ति अपने सम्मान की कीमत पर आभार नहीं व्यक्त कर सकता, कोई भी महिला अपनी शुचिता की कीमत पर आभार नहीं व्यक्त कर सकती और कोई भी राष्ट्र अपनी स्वंतत्रता की कीमत पर आभार व्यक्त नहीं कर सकता। यह सावधानी भारत के मामले में किसी अन्य देश की तुलना में कहीं अधिक आवश्यक है क्योंकि भारत में भक्ति या भक्तिमार्ग या नायक-पूजा को राजनीति में बड़ा स्थान है किसी अन्य देश की तुलना में इनकी भूमिका राजनीति में बहुत अधिक है, धर्म के मामले में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है। लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा गिरावट और तानाशाही लाने का मार्ग है।
तीसरी चीज यह है कि हमें केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए। यदि राजनीतिक लोकतंत्र की जड़ में सामाजिक लोकतंत्र नहीं हो, तो राजनीतिक लोकतंत्र लंबे समय तक नहीं चल सकता। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है जीने का ऐसा तरीका जिसमें स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता दी जाए। स्वतंत्रता समानता और भाईचारे को अलग-अलग नहीं मानना चाहिए। न ही स्वतंत्रता और समानता को भाईचारे से अलग किया जा सकता है। बिना समानता के स्वतंत्रता कुछेक लोगों की बहुत सारे लोगों पर श्रेष्ठता कायम कर देगी। स्वतंत्रता के बिना समानता व्यक्ति की पहल को मार देगी। भाईचारे के बिना, स्वतंत्रता और समानता नैसर्गिक रूप नहीं ले सकती। उन्हें लागू करने के लिए एक सिपाही की जरूरत पड़ेगी। हमें इस तथ्य को स्वीकार करके शुरूआत करनी चाहिए कि भारतीय समाज में दो चीजों का पूरा अभाव है। एक तो समानता। सामाजिक धरातल पर भारत में हमारा समाज ख्ांडित असमानता के सिद्धांत पर आधारित है जिसका अर्थ है कुछ लोगों को ऊपर उठाना कुछ लोगों को नीचे गिराना। आर्थिक धरातल पर हमारे यहाँ ऐसा समाज है जिसमें कुछ लोगों के पास काफी धन है जबकि अधिकतर लोग भीषण गरीबी में जीते हैं। 26 जनवरी, 1950 को हम परस्पर विरोधी जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे यहाँ समानता होगी और सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में असमानता व्याप्त होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक मत को सिद्धांत को मान्यता देंगे। हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण एक व्यक्ति एक मूल्य का सिद्धांत नकारते रहेंगे। इस विरोधपूर्ण जीवन को हम कब तक जारी रखेंगे? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता से लोगों को वंचित रखेंगे?